बुधवार, 12 अगस्त 2015

सिनेमा में दादा साहब फाल्के का योगदान



भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहब फाल्के का मूल नाम ढूंडिराज गोविंद फाल्के था। उन्हें आदर से दादा साहब फाल्के कहा जाता था। उनका जन्म 30 अप्रैल 1870 को नासिक जिले के त्रयब्म्केश्वर गाँव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पारिवारिक परंपरानुसार उन्हें पुरोहताई की शिक्षा दी गई लेकिन उनका मन नाट्य अभिनय चित्रकला और जादूगरी में लगता था। दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद फाल्के बंबई के जे॰जे॰स्कूल ऑफ आर्ट्स में प्रवेश लिया। वहाँ से पढ़ाई पूरी करने क बाद फाल्के ने बड़ौदा के काला भवन से फोटोग्राफी का प्रशिक्षण लिया। फोटोग्राफी के बाद मॉडलिंग और आर्किटेक्ट का भी प्रशिक्षण लिया। फिर रंगीन छपाई का काम सीखा। तत्कालीन मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा के लिथोग्राफी प्रेस में उन्होने काम भी किया था।
दादा साहब फाल्के ने चालीस साल की उम्र में,1910 में बंबई के एक तम्बू सिनेमा घर में क्राइस्ट के जीवन पर आधारित फिल्म देखी तो यह विचार किया की ऐसी ही फिल्म रामायण और महाभारत की कथाओं पर बननी चाहिए और उसी दौरान फिल्मी जीवन को अपनाने की योजना बना ली। अगले सालभर तक वे लगातार सिनेमा घरों के चक्कर लगाकर फिल्में देखते रहे। वे देखे गए फिल्मों का तकनीकी विश्लेषण करते थे और बेहद साधारण कैमरे से फोटो खींचते थे। उनकी पत्नी सरस्वती काकी ने उनके इन उपक्रमों में पूरा सहयोग दिया।
रात-दिन लगातार फिल्में देखने और जागने के कारण उन्हें दिखाई पड़ना बंद हो गया। सलभर इलाज के बाद उनके आँखों की रौशनी वापस लौटी। बीमारी के दौरान किए गए चिंतन और अनुभव के कारण फाल्के फिल्म तकनीक को जल्दी सीख सके। स्वस्थ होकर उन्होने मटर के दाने को गमले में बो दिया और रोज एक फ्रेम उसकी तस्वीर खींचने लगे। पौधे के विकसित होने तक वे ऐसा करते रहे। जिस दिन मटर का पूरा पौधा उग आया फाल्के की पहली फिल्म “मटर के बीज का विकास” भी बनकर तैयार हो गई। इस फिल्म को दिखाकर उन्होने अपने व्यवसायी मित्र नाड्कर्णी से बाजार भाव के सूद पर पैसे लिए और ‘ए बी सी ऑफ सिनेमैटोग्राफी’ पुस्तक, सिनेमा के उपकरण बेचनेवाली कंपनियों के पते व मूल्य सूचियों के साथ 1 फ़रवरी 1912 को कैमरा खरीदने लंदन रवाना हो गए।
लंदन में ‘बयास्कोप’ फिल्म पत्रिका के संपादक मि॰ कैबोर्न के सहयोग से “ए बी सी ऑफ सिनेमैटोग्राफी” पुस्तक के लेखक मि॰ सिसिल हेपवर्थ से मिले। हेपवर्थ ‘वाल्टन’ फिल्म कंपनी चलाते थे। उन्होने फाल्के को फिल्म बनाने का प्रशिक्षण दिया और कंपनी के सभी विभागों को देखने का अवसर दिया। 1 अप्रैल 1912 को विलियम्सन कैमरा, कच्ची फिल्म, फिल्म धोने और प्रिंट बनाने के उपकरणों तथा परफ़ोरेटर लेकर दादा साहब फाल्के भारत लौटे।
भारत आकार दादा साहब फाल्के ने “सत्य हरिश्चंद्र” फिल्म बनाने का निश्चय किया क्योंकि उन्ही दिनों बंबे में सत्य हरिश्चंद्र नाटक बहुत लोकप्रिय हो रहा था। फाल्के दंपति के छह महीने की लगातार मेहनत के बाद वह फिल्म 3 मई 1913 को रिलीज हुई। फिल्म का नियमित शो मुंबई के ‘कोरोनेशन सिनेमा’ मे तेईस दिनों तक हुआ। तब यह बहुत बड़ी सफलता थी। यह फिल्म बनाने का निश्चय उन्होने अपने अनुभव और व्यावसायिक समझ के आधार पर लिया था। उस फिल्म की सफलता से उत्साहित होकर दादा साहब फाल्के ने 1913 मे ही “मोहिनी भस्मासुर” और 1914 में “सावित्री सत्यवान” फिल्म का निर्माण किया। इसी बीच फाल्के ने नासिक में स्टुडियो स्थापित कर लिया क्योंकि वहाँ उन्हें नदी-नाले, पहाड़ियाँ, खुला मैदान सब मिल गया था। तब उनके साथ सौ से अधिक स्टाफ काम करते थे।
फिल्म के तीस से अधिक प्रिंट बनाने के लिए हाथ से चलने वाली मशीन की जरूरत थी इसलिए 1914 में फाल्के पुन: लंदन गए। इस बार उनके साथ उनकी बनाई हुई फिल्में भी थी जिसे वहाँ के निर्माताओं ने बहुत पसंद किया। दादा साहब इंगलेंड से भारत लौटे तो प्रथम विश्व युद्ध छिड़ चुका था। युद्ध के कारण फिल्में चलना कम हो गई थी। युद्ध 1918 तक चला, अनेक मशीने खराब हो गई फाल्के आर्थिक कठिनाई में पड़ गए। किसी तरह कर्ज लेकर फिल्में बनाने का कार्य जारी रखा लेकिन थोड़े समय बाद कर्ज मिलना बंद हो गया। लेकिन उन्होने अपने ससुर के सहयोग से लंकादहन फिल्म बनाकर अपनी प्रतिष्ठा पुन: स्थापित किया। इसके बाद फाल्के ने मूलशंकर भट्ट और बामनराव आपटे के सहयोग से ‘हिंदुस्तान फिल्म कंपनी’ की स्थापना की। बाद के दौर में फाल्के ने अपनी बेटी मन्दाकिनी को कृष्ण की भूमिका में लेकर ‘कालिया मर्दन’ और ‘कृष्ण जन्म’ फिल्में बनाई। फाल्के ने एक शिक्षाप्रद फिल्म ‘हाउ फिल्म्स आर मेड’ बनाकर लोगों को फिल्म विधा की जानकारी दी। उसके बाद अपने भागीदारों से विवाद के कारण वो बनारस चले गए। पाँच वर्ष बाद जब लौटे तो फिल्म उदद्योग का स्वरूप बिलकुल बादल गया था। कंपनियाँ अमेरिकी फिल्मों की नकल में लगी हुई थी। इस माहौल में फाल्के फिट नही हो पाए। लेकिन मायाशंकर भट्ट के प्रोत्साहन पर 1932 में उन्होने मूक फिल्म ‘सेतु बंधन’ बनाई पर उन्हे पहले जैसी लोकप्रियता नही मिली। 64 साल की उम्र में उन्होने अपनी एकमात्र सवाक फिल्म ‘गंगावतरण’ का निर्माण किया। 16 फरवरी 1944 को 71 वर्ष की उम्र में दादा साहब फाल्के का देहांत हो गया। तब तक लोग उन्हे लगभग भूल चुके थे।
दादा साहब फाल्के ने 1913 से 1933 तक 95 फीचर तथा 26 लघु फिल्में बनाई। इन संख्या से अधिक महत्वपूर्ण योगदान दादा साहब फाल्के का है सिनेमा की भाषा को समृद्ध करना, जिसकी शुरुआत उन्होने शून्य से की थी। वास्तव में दादा साहब फाल्के भारतीय सिनेमा के जनक थे। लोग एक कदम आगे बढ़कर उन्हे भारतीय सिनेमा का पितामह कहते हैं। उनके लिए यह सम्मान सर्वथा उचित है।










 संदर्भ :
1.  सिनेमा उद्भव और विकास – रयाज़ हसन।
2.  इंटरनेट (विकिपीडिया)।
    


सृजन प्रक्रिया और कलाकार की सौंदर्यानुभूति



संसार के किसी भी कला की कोई भी सुंदर कलाकृति को जब हम देखते हैं तो मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। संगीत जैसी कलाओं में हम सुनते हुए भी इसी स्थिति में होते हैं। सामान्य प्रेक्षक तो आनंदोपलब्धि तक ही सीमित रहता है लेकिन विचारशील प्रेक्षक के मन में यह प्रश्न जरूर कौंधता है की आखिर इतनी अच्छी कलाकृति या रचना का निर्माण हुआ कैसे? इसी प्रश्न के उत्तर में छिपा होता है सृजन की प्रक्रिया और कलाकार की सौंदर्यनुभूति।
सृजन की प्रक्रिया पर विभिन्न पश्चिमी और भारतीय विद्वानों ने विचार किया है। कुछ प्रख्यात बहिर्मुखी कलाकारों ने भी अपनी आत्मकथा आदि में सृजन की प्रक्रिया के दौरान मानसिक और बाह्य स्थितियों संतुलन और द्वंदों का वर्णन किया है। कल्पना विभिन्न चरणों से गुजरकर और भौतिक आधार प्राप्त कर कलाकृति के रूप में परिणत होती है। कल्पना पूरी तरह से मन का विषय है इसलिए मनोवैज्ञानिकों ने भी सृजन की प्रक्रिया पर विचार किया है। इन्हीं आधारों पर सृजन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास किया जाता है।
दर्शनिकों, कलाकारों और मनोवैज्ञानिकों में से किसी एक की बातों को ही तथ्यरूप में स्वीकार करना एकांगी हो जाएगा इसलिए तीनों के मतों पर समग्रता से विचार करके ही सृजन की प्रक्रिया पर ठोस धारणा बनती है। वर्तमान में सृजन प्रक्रिया के वर्णन विश्लेषण के लिए ‘सृजनशास्त्र’ के नाम से एक अलग शास्त्र ही विकसित हो चुका है। अंग्रेजी में इसे ‘साइनेटिक्स’ कहते हैं। ‘साइनेटिक्स’ ने सौंदर्यशास्त्र के अध्ययन में युगांतकारी पहल किया है।
सृजन की प्रक्रिया में कृति या कर्ता के अंतर्मुखी चरण और बहिर्मुखी चरण का संयोग पर्यावरण की भूमिका के साथ निवेशित होकर कलाकृति के रूप में प्रतिफलित होती है। यह कलाकृति एक भौतिक वस्तु होती है। कृति निर्माण के लिए रूपावदान में माध्यम अंतर्मुखी चरण बहिर्मुखी चरण के रूप में रूपांतरित कर देता है। कला से एक ऐसी प्रक्रिया का बोध होता है जो कलाकृति को अपने लक्ष्य, भावोद्भावना की ओर अग्रसर करती है। कलाकृति एक अभिव्यंजनात्मक और कुछ अंशो में भावात्मक रूप है जो करने तथा रचने से प्राप्त होता है। यहाँ करना नाटक और नृत्य जैसी कलाओं से संबन्धित है तो रचना चित्र, मूर्ति और काव्यकलाओं से। कलाकृति का रूप मानवीय प्रत्यक्षीकरण के आनंदमूलक क्षेत्र से भी जुड़ा होता है जिसका भोग मन द्वारा होता है। इसप्रकार कलाकृति में एक भौतिक वस्तु, मानवीय क्रिया मानवीय आशंसा तीनों का मेल होता है। यह मेल ही कलाकृति को सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य देता है।
प्रत्येक कला का किसी न किसी भौतिक वस्तु से वास्ता रहता है। वह भौतिक वस्तु चाहे शरीर हो या शरीर से परे अन्य वस्तु। चाहे कोई उपकरण का इस्तेमाल हो या नहीं निर्माण अवश्य होता है। यह निर्माण एक ओर  वास्तविक जगत का होकर भी उससे स्वतंत्र होता है तो दूसरी ओर कलात्मक एवं सांस्कृतिक परंपरा से संघटित होकर भी स्वकीय होता है। इसलिए सृजन प्रक्रिया में मौलिकता एवं परंपरा, वैयक्तिकता एवं सामूहिकता द्वंदात्मक रूप से साथ-साथ होता है। यह भी माना जाता है की सृजन प्रक्रिया अवचेतन का आवेश मात्र होता होता है जिसमें संवेग ही प्रमुख होते हैं। वास्तव में पूरा सृजनात्मक कार्य अचेतन के क्षेत्र से गुजरकर ही चेतना में साकार होती है। यह कार्य चिंतन के द्वारा सम्पन्न होता है। इस तरह यह सिर्फ मानसिक कार्य कहा जा सकता है लेकिन वास्तव में शरीर और मस्तिष्क का उचित समन्वय इसे जीवंत और पूर्ण बनाता है।
सृजन प्रक्रिया चाहे करने से संबन्धित हो या फिर रचने से इसमें आंतरिक तथा बाह्य संप्रेषणीयता और पर्यावरण की भूमिका संतुलित करके प्रत्यक्षीकरण का कर्ता कलाकार होता है। कलाकार किसी प्रयोजन के लिए पदार्थ को जिस ढंग से आकृति देने की कोशिश करता है वह कोशिश उसके कौशल पर आश्रित होता है। कौशल के माध्यम से ही पदार्थ को आकृति देने में सृजनात्मक व्यवस्था का निवेश करता है। यह सृजनात्मक व्यवस्था परम्परावर्ती न होकर मौलिक होती है।
कलाकार जब प्रकृति के कोई दृश्य या भावना से प्रेरित होता है तो वह उसका हू-ब-हू अनुकृति का निर्माण नहीं कर डालता है। कलाकार की प्रेरणा के साथ-साथ उसके अवचेतन में छिपे संस्कार और कल्पना का संयोग होता है। इस संयोग से एक मानस मूर्ति उसके मन में बनती है। इस मानस मूर्ति का आधार बिम्ब और प्रतीक होते हैं। कलाकार के मन में बनी मूर्ति का सौन्दर्य उसे प्रयाप्त आनंद प्रदान करता है। लेकिन दूसरे लोग भी आनंद प्राप्त कर सकें इसलिए और सृजन के क्षणों का विलक्षण आनंद प्राप्त करने के लिए वह अपने कौशल से संबन्धित भौतिक माध्यम का सहारा लेकर मानस मूर्ति को ठोस रूपाकार प्रदान करता है। अब प्रश्न उठता है कि क्या कलाकृति हू-ब-हू कलाकार कि मानस मूर्ति जैसी होती है?
कलाकार कि मानस मूर्ति और कलाकृति का साम्य कई बातों पर निर्भर करता है। कलाकार जिस किसी भी माध्यम का उपयोग करता है उस माध्यम की एक सीमा होती है। वह सीमा मानस मूर्ति के प्रत्यक्षीकरण में प्रतिरोध उत्पन्न करता है। प्रतिरोध के अन्य तत्व होते हैं वातावरण, कलाकार की प्रवणता और अर्थ। इन प्रतिरोधों की जटिलता जितनी कम होती है, मानस मूर्ति से कलाकृति का साम्य उतना ही अधिक होता है। इसके अतिरिक्त कलाकार की मानसिक संचरणशीलता भी सृजन को प्रभावित करती है। वास्तव मे कलाकार की मानस मूर्ति संवेगों, चिंतन, कल्पना, संस्कारों का घनीभूत रूप होता है। मनुष्य के मन का स्वभाव ही ऐसा है की वह चिंतन और कल्पना को रूढ़ नहीं होने देता है। इसलिए उनमें संचरणशीलता होती है। चिंतन की संचरणशीलता सृजन के क्षणों में भी बरकरार रहती है। इस कारण से मानस मूर्ति का रूप भौतिक मूर्ति की तरह स्थिर नहीं रह पाता है बल्कि सृजन के दौरान भी इसके रूप मे कामोबेश परिवर्तन होता रहता है। इसलिए यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि कलाकृति ठीक वैसी नहीं होती है जैसी कलाकार कि मानस मूर्ति होती है। लेकिन वह मानस मूर्ति से ज्यादा भिन्न भी नहीं होती है। इसलिए कलकृति अपने सौन्दर्य के बल पर प्रेक्षकों को लगभग वैसा ही आनंद प्रदान करने में सक्षम होती है जैसा कलाकार को प्राप्त हुआ रहता है। यह सौंदर्यबोध और संगत आनंद की आदर्श स्थिति है जो आदर्श प्रेक्षकों के संदर्भ में ही सत्य होती है। क्योकि कलाकृति के सौन्दर्य से मिलनेवाले आनंद का नियामक कलाकार की योग्यता, माध्यम, वातावरण के अतिरिक्त प्रेक्षकों की सहृदयता भी होती है।




संदर्भ :
1.  अथातो सौन्दर्य जिज्ञासा – रमेश कुंतल मेघ।
2.  सौन्दर्य शास्त्र – डॉ॰ ममता चतुर्वेदी।
3.  कक्षा व्याख्यान – डॉ॰ प्रभात त्रिपाठी।

शनिवार, 16 मई 2015

दृश्य विन्यास की प्रक्रिया एवं आवश्यकताएँ



बिना ताम-झाम के भी नाटक हो सकता है, यह बात जितनी सत्य है उतनी ही यह बात भी सत्य है कि दृश्य विन्यास के कारण नाट्य प्रस्तुति बहुत ही प्रभावशाली हो जाती है। नाट्य प्रस्तुति के दौरान दृश्य विन्यास के द्वारा होने वाले कार्य हैं :
·      नाट्य क्रिया का वातावरण का निर्माण
·      नाट्य क्रिया का स्थल निर्धारण
·      नाट्य क्रिया में अभिवृद्धि करना 
·      नाट्य क्रिया का सौन्दर्य बढ़ाना
उपरोक्त तीनों कार्यों के लिए यह आवश्यक है कि दृश्य विन्यास नाट्यानुकूल, अभिव्यक्तिपूर्ण, आकर्षक, स्पष्ट, सरल, उपयोगी और व्यावहारिक हो। दृश्य विन्यास की इन सब विशेषताओं को प्राप्त करने के लिए कोई निश्चित और निर्धारित नियम नहीं है जो दृश्य विन्यासकर्ता के लिए आवश्यक माना जाए। किसी भी दृश्य विन्यासकर्ता की कार्य कुशलता, उसका अनुभव और उसकी रचनात्मकता पर निर्भर करता है। इसलिए वह अपने कार्य करने का तरीका स्वयं निर्धारित करता है। फिर भी दृश्य विन्यास की प्रक्रिया के दौरान संभावित या अवांछित समस्याओं का हल सुगमता से प्राप्त करने के लिए कुछ बातों पर ध्यान देना बहुत ही लाभदायक होता है। दृश्य विन्यास की प्रक्रिया के दौरान जिन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए उनका बिंदुवार वर्णन निम्नलिखित है।
1॰ नाट्यालेख का विश्लेषण
दृश्य विन्यासकर्ता किसी भी नाट्यालेख का सरसरी तौर पर अध्ययन करके उसकी प्रस्तुति के लिए आदर्श दृश्य विन्यास कर सकने में सक्षम होगा यह संभव नहीं है। आदर्श विन्यास के लिए विन्यासकर्ता को चाहिए की निर्देशक से विचार-विमर्श के पूर्व नाट्यालेख का अध्ययन भलीभाँति समझते हुए करे। इससे वह प्रस्तुति के संदर्भ में निर्देशक की जरूरत को आसानी से समझ सकेगा। विन्यास लिए विन्यासकर्ता को कई बार नाट्यालेख का अध्ययन करना पड़ सकता है। नाट्यालेख का पहला अध्ययन एक ही बैठक में करना चाहिए। इससे विन्यासकर्ता नाटक का केंद्रीय भाव, देशकाल, स्थान क्या है और किस प्रकार के पात्र नाट्य क्रिया को सम्पन्न करेंगे, इसे समझने में सक्षम होगा। पहला अध्ययन दृश्य विन्यास की कल्पना का आधार प्रदान करता है। नाट्यालेख का दूसरा अध्ययन नाटक के विभिन्न पक्ष : भौतिक, शिल्पगत, व्याख्यात्मक और व्यवहारिक, पर विचार करते हुए करना चाहिए। एक अच्छा निर्देशक भी इन पक्षों पर विचार करते हुए नाट्यालेख का अध्ययन करता है। अगर विन्यासकर्ता नाटक के विभिन्न पक्षों पर विचार करते हुए अध्ययन नहीं करेगा तो वह निर्देशक के मंतव्य को पूरी तरह से समझ नहीं सकेगा। अगर विन्यासकर्ता को निर्देशक से पूरी स्वतंत्रता मिल भी जाए फिर भी आदर्श दृश्य विन्यास के लिए नाट्यालेख के इन पक्षों का विश्लेषण करना अकनिवार्य समझा जाता है।
कई बार नए विन्यासकर्ता या अतिआत्मविश्वासी विन्यासकर्ता नाट्यालेख प्राप्त होते ही विन्यास के प्रति स्वयं की अवधारणा विकसित करने के बजाय उस आलेख की पूर्व मंच प्रस्तुतियों में हुए मंच सज्जा के आधार पर विन्यास की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं। यह दृष्टिकोण बहुत ही घातक होता है। इससे विन्यासकर्ता की मौलिक प्रतिभा बाधित होकर मृतप्राय होने लगती है। विन्यास की स्वतंत्र अवधारणा का विकास की आदत उसकी प्रतिभा में निखार लाकर उसे कुशल विन्यासकर्ता बनने की ओर अग्रसर करती है। विन्यास की स्वतंत्र अवधारणा के लिए नाट्यालेख का गहन अध्ययन और विश्लेषण आवश्यक है। यह विन्यासकर्ता को व्यक्तिगत लाभ भी पंहुचता है।
मंच की स्थिति के कारण कई बार विन्यासकर्ता के लिए नाटककार द्वारा विन्यास के लिए दिये गए संकेतों का अक्षरशः पालन करना संभव नहीं होता है। इसलिए विन्यासकर्ता को अपने हिसाब से विन्यास करना पड़ता है या फिर नाटककार द्वारा सुझाए गए विन्यास में बदलाव लाना पड़ता है। इस स्थिति में नाट्य प्रस्तुति के लिए जरूरी दृश्य विन्यास तभी संभव होता है जब विन्यासकर्ता नाट्यालेख का भलीभाँति अध्ययन किया हो।
उपरोक्त तथ्य को देखते हुए हम यह कह सकते हैं की आदर्श विन्यास के लिए विन्यासकर्ता द्वारा नाट्यालेख का अध्ययन-विश्लेषण आवश्यक रूप से किया जाना चाहिए।           
2॰ प्रस्तुति सदस्यों के साथ विचार-विमर्श
किसी भी नई नाट्य प्रस्तुति की तैयारी के लिए यह आवश्यक होता है कि प्रस्तुति से जुड़े सदस्यों के बीच कम-से-कम एक बार विस्तार से विचार-विमर्श हो। विचार-विमर्श के आभाव में यह संभावना बनी रहती है कि दृश्य विन्यासकर्ता का दृष्टिकोण निर्देशक या अन्य पक्षों के प्रभारी से नहीं मिले। ऐसी स्थिति में प्रस्तुति की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रस्तुति की सफलता के लिए इससे जुड़े सदस्यों के साथ विचार-विमर्श आवश्यक होता है। विचार-विमर्श के दौरान ही दृश्य विन्यासकर्ता को विन्यास के लिए आवश्यक जानकारी, जैसे- विन्यास की शैली, प्रदर्शन का समय, दृश्य सज्जा के लिए निर्धारित बजट, प्रेक्षागृह और मंच क्षेत्र, उपलब्ध उपकरण आदि पर चर्चा कर लेनी चाहिए जिससे व्यवहारिक कार्य शुरू करने में अनावश्यक देरी न हो और कार्य के बीच में कोई परेशानी आए तो तुरंत उसका निराकरण हो सके। दृश्य विन्यास के प्रति अपनी सोच और मनोभावों को विन्यासकर्ता विकल्प के तौर पर विचार-विमर्श के दौरान ही निर्देशक को बताता है जो उसके लिए कार्य स्वतंत्रता प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।   
3॰ नाट्य प्रस्तुति की तकनीकी आवश्यकताएँ
जब प्रस्तुति के लिए कम दृश्य सज्जा की जरूरत हो तो ज्यादा परेशानी नहीं होती है लेकिन अगर जब बहुत दृश्य सज्जा और उसके परिवर्तन की जरूरत होती है तो परेशानी शुरू हो जाती है। इन परेशानियों से बचने के लिए कई प्रकार के मंचों का निर्माण हुआ है। लेखक भी इस बात का ध्यान रखते हैं कि नाटक ऐसे न लिखे जाएँ जिसकी दृश्य सज्जा जटिल हो और निर्देशक भी ऐसी प्रस्तुति से बचते हैं। लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। न हर जगह सुविधाजनक मंच मिल सकता है और न सिर्फ दृश्य विन्यास की जटिलता के लिए अच्छे विषय पर आधारित नाटक की उपेक्षा उचित है। पर यह भी सत्य है कि अधिक दृश्य सजा के कारण दृश्य परिवर्तन में अनावश्यक विलंब या व्यावधान होता है तथा नाट्य क्रिया कि गति और निरंतरता भंग होती है। इस स्थिति में विन्यासकर्ता अतिरिक्त तकनीक का प्रयोग करके प्रस्तुति को सफल बनाता है। इसके लिए विन्यासकर्ता को सभी प्रकार के तकनीक की जानकारी होनी चाहिए जिसका वह अपने अनुभव और बुद्धि से रचनात्मक उपयोग कर सके।    
4॰ मंच क्षेत्र एवं उपलब्ध सुविधाएं
यह संभव नहीं है कि विन्यासकर्ता को हर जगह आदर्श मंच क्षेत्र और सारी सुविधाएं उपलब्ध हो क्योंकि हमारे देश के बड़े शहरों में ही कुछ ही प्रेक्षागृह आदर्श और सुविधा सम्पन्न हैं, पर नाटक छोटे शहरों में, स्कूल, कॉलेज एवं अस्थाई मंचों पर भी होता है और दृश्य विन्यासकर्ता को विन्यास करना होता है। ऐसी स्थिति में विन्यासकर्ता को विन्यास से पहले जिन बातों का अवलोकन करना पड़ता है वह हैं, मंच क्षेत्र और दर्शक दीर्घा के बीच दृष्टि रेखा, मंच की आकृति, लम्बवत और क्षैतिज पर्दों के उपयोग की संभावना, मुख्य पर्दे का उठने और गिरने का ढंग, प्रकाश सेतु की दूरी और उसकी क्षमता, नेपत्थ और उसमें लगे उपकरण, दृश्य इकाइयों को फ्लाई में ले जाने की व्यवस्था और उसके लिए आवश्यक बेटन की स्थिति, सायक्लोरामा की स्थिति, मंच क्षेत्र पर कील और पेंच लगाए जाने की सुविधा, प्रकाश संचालन का स्थान और अगर मंच गतिशील है तो उसके संचालन का स्थान, स्थिति और तरीका। 
उपरोक्त स्थितियों का अवलोकन कर लेने के बाद किसी भी मंच पर प्रदत्त परिस्थितियों के अनुसार विन्यासकर्ता सुगमता से विन्यास कर सकता है।
5॰ दृश्य विन्यास कार्यशाला एवं उपलब्ध उपकरण
दृश्य विन्यासकर्ता को विन्यास की आधार योजना  बनाने के पहले कार्यशाला की स्थिति, उसकी क्षमता, मंच के सापेक्ष उसकी दूरी, सीमाएं और कार्यशाला में उपलब्ध उपकरण का आकलन कर लेना चाहिये क्योंकि ये सब भी कार्य की जटिलता या सुगमता के निर्धारक होते हैं।
6॰ दृष्टि रेखाएँ
दर्शक दीर्घा से मंच तक आनेवाली सभी दृष्टि रेखाओं से और प्रकाश की विभिन्न तीव्रता के सापेक्ष दृश्य विन्यास स्पष्ट दिखाई पड़े इसके लिए विन्यासकर्ता को चाहिए की वह मंच के क्षैतिज प्रभाग और लम्बवत प्रभाग को ध्यान में रखकर विन्यास का आकार-प्रकार निर्धारित करे।
7॰ शोध कार्य
भिन्न-भिन्न नाटकों के देशकाल और परिवेश अलग-अलग होते हैं। विन्यासकर्ता को नाटक में वर्णित देशकाल और परिवेश के अनुसार ही दृश्य सज्जा करनी होती है अन्यथा प्रस्तुति को हास्यास्पद होते देर नहीं लगती है। विन्यासकर्ता को नाटक के देशकाल और परिवेश के स्थापत्य, रहन-सहन और साज-सज्जा की गहरी जानकारी होनी चाहिए। सतही जानकारी से विश्वसनीय और प्रभावशाली दृश्य सज्जा नहीं की जा सकती है। अतः विन्यासकर्ता को नाटक के देशकाल और परिवेश पर शोध करना चाहिए तभी वह आदर्श, विश्वसनीय और प्रभावशाली दृश्य विन्यास कर पाएगा। शोध के पश्चात किया गया दृश्य विन्यास, विन्यासकर्ता को निश्चय ही ख्याति प्रदान करता है।  
8॰ रेखाचित्र एवं लघु आकारीय मॉडल
प्रस्तुति में सम्मलित सभी लोगों को दृश्य सज्जा का स्पष्ट रूपाकार सूचित होना चाहिए ताकि वह कुछ सुझाव देना चाहें तो दे सकें। इसके लिए विन्यासकर्ता कल्पित विन्यास का रेखाचित्र या 3डी मॉडल तैयार करता है। यह कार्य विन्यासकर्ता के लिए भी उपयोगी होता है क्योंकि विन्यास योजना की जो खामियाँ उसके मन की आँखों से छिपी होती है वह इससे आसानी से पता चल जाती है जिसे वह समय रहते दूर कर लेता है। दृश्य विन्यास का रेखाचित्र से ज्यादा प्रभावी उसका 3डी मॉडल होता है जिसे गत्तों, थर्मोकोल, खपच्चियों आदि को गोंद से चिपका कर तैयार किया जाता है।   
9॰ विन्यास की योजना
कल्पित दृश्य सज्जा का रेखाचित्र या मॉडल से विन्यास की आकृति-प्रकृति का पता तो चलता है लेकिन मंच पर उसका वास्तविक आकार क्या होगा इसके लिए विन्यास की विस्तृत योजना तैयार करना आवश्यक होता है क्योंकि मॉडल के आकार से विन्यास के वास्तविक आकार का पता लगाना तकनीशियनों के लिए कठिन होता है। इसलिए विन्यासकर्ता दृश्य सज्जा के प्रत्येक भाग का उचित नाप के साथ अलग-अलग चित्र बनाता है। ताकि तकनीशियन आसानी से अपना काम कर सकें। दृश्य सज्जा के मोटे भागों के अतिरिक्त सूक्ष्म सज्जा, जो रेखाचित्र में दिखाई भी नहीं पड़ते हैं, विन्यासकर्ता को उनका वास्तविक चित्र बनाना पड़ता है। विन्यास योजना के बिना वैसा ही विन्यास, जैसा विन्यासकर्ता चाहता है, तैयार करना संभव नहीं हो सकता है।
10॰ सामाग्री का चयन
दृश्य सज्जा का अलंकरण और उचित परिवेश दिखाने के लिए विभिन्न सामाग्री यथा पर्दे ,चादर, फर्नीचर आदि का चयन करना पड़ता है। इसे हम मंच सामग्री भी कहते हैं। यह सामग्री नाटक के देशकाल के अनुरूप और विन्यास में प्रयुक्त रंगो के अनुकूल होना चाहिए। उचित अलंकरण और सामाग्री के अभाव में कुशलतापूर्वक किया गया दृश्य विन्यास भी प्रभावित होता है। मंच सामाग्री के चयन या निर्माण में निर्देशक की राय लेना आवश्यक होता है क्योंकि ये सामाग्री नाट्य क्रिया में प्रत्यक्षतः सहायक होती हैं।
11॰ दृश्य रंगन
दृश्य विन्यास में रंगों का बहुत ज्यादा महत्व होता है। इसलिए विन्यासकर्ता को दृश्य सज्जा का रंगन अपने देख-रेख में करवाना चाहिए क्योंकि यह आवश्यक नहीं है कि रंग करनेवाला तकनीशियन अनुभवी हो। रंगन में हुई थोड़ी भी गलती साज- सज्जा को प्रभावहीन कर सकता है। इसलिए इसमें अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत होती है।
12॰ तैयार दृश्य सज्जा का अलंकरण और अंतिम रूप प्रदान करना।
मंच पर पूरी दृश्य सज्जा लगाने के बाद विन्यासकर्ता का अंतिम कार्य उसके अलंकरण और आवश्यक कमियों को दूर करना होता है। अगर प्रारम्भिक कार्य सही से हुआ हो तो यह अंतिम कार्य मात्र औपचारिक होता है। फिर भी सामग्रियों की सही स्थिति, पर्दा खुलने से कोई व्यावधान आदि को देख-भाल लेना आवश्यक होता है।
यह आवश्यक नहीं है कि दृश्य विन्यासकर्ता उपरोक्त सभी बातों का पालन करे ही। वह अपने अनुभव और प्रशिक्षण के अनुसार कुछ बातों को छोड़ सकता है या उनका क्रम बदल सकता है। लेकिन एक नए विन्यासकर्ता को चाहिए कि वह उपरोक्त सभी बातों का इसी क्रम में पालन करे। इससे वह सुंदर और सटीक दृश्य विन्यास सरलता से कर पाने में सक्षम होगा।