शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

पश्चिमी चित्रकला का संक्षिप्त इतिहास



कला मानव मन की ऐसी रचनात्मक अभिव्यक्ति है जिसके माध्यम से वास्तविक और काल्पनिक स्थितियों को चित्रित किया जाता है. उसकी सुदंरता को कैनवास, पेपर, पत्थर और दीवारों पर उकेरा जाता है. आमतौर पर जब हम कला की बात करते हैं तब उसका अभिप्राय, वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला से होता है. कला विश्व की ऐसी कलात्मक और अनूठी पहचान है जिससे किसी भी देश की संस्कृति और सभ्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है. कला की कलात्मकता इससे परलक्षित होती है कि कलाकार और हस्तशिल्पी अपनी रचनात्मक अंगुलियों से वही दिखाता है जो वास्तव में सच होता है. कला को वास्तविक और मूर्त रूप कलाकारों की कल्पना ने दिया. जिन्होंने इसको दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा दिया. आधुनिक कला को हम मनुष्य की कलापूर्ण प्रवृत्ति का साक्षात् प्रमाण मानते है. जिसकी सुंदरता दुनिया के विभिन्न चित्रकारों ने अपनी कला से प्रकट की है. प्रकृति और कला का नाता बहुत ही प्राचीन है. इनका अस्तित्व ही मनुष्य को जीवंत बनाए हुए है. कला की उत्पत्ति के चिन्ह हमें गुफाओं और शिलाखण्डों पर उकरी गई विशेष आकृति में देखने को मिलते हैं. इसलिए चित्रकला को ही सबसे प्राचीन कला मानना तर्क संगत लगता है.
विश्व के विभिन्न भागों में गुफाओं आदि से प्राप्त चित्रित आकृतिओं का तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद भी चित्रकला की उत्पत्ति कब हुई, इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है, निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है क्योंकि अब तक मिले साक्ष्य अंतिम साक्ष्य नहीं हैं. वर्तमान समय में यह माना जाता है कि 27000-13000 ई.पू. में दक्षिण-पश्चिम यूरोप में गुफा कला के द्वारा तत्कालीन मानव ने अपने जीवन का चित्रण किया और वहीं से पश्चिमी कला की शुरुआत. भारत की तरह पश्चिम में चित्रकला की उत्पत्ति का कोई दैवी सिद्धांत (भारत में राजा नग्नजित का प्रसंग) मान्य नहीं हैं. वहां चित्रकला की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धांत ही मान्य है. प्रागैतिहासिक काल के बाद पश्चिम में चित्रकला की ठोस जानकारी प्राचीन गौरवशाली ग्रीक युग से मिलती है. ग्रीक चित्रकला बहुत उत्कृष्ट थी जिससे रोमन प्रभावित हुए. इसी तरह क्रमिक युगों में अपनी पूर्ववर्ती कला, स्थितिओं, विचारधाराओं या वादों से प्रभावित होकर पश्चिमी चित्रकला आगे बढ़ी जिसका क्रमबद्ध वर्णन निम्नप्रकार है.
प्राचीन रोमन व ग्रीक चित्रकला :
प्राचीन ग्रीक संस्कृति ज्ञान-विज्ञान-राजनीति और नाट्यकला की तरह ही  दृश्य कला (visual art) यानि चित्रकला और मूर्तिकला के क्षेत्र में भी अपने आसाधारण योगदान के लिए विख्यात है. प्राचीन ग्रीक चित्रकारी मुख्यतया अलंकृत पात्रों के रूप में मिली है. ‘प्लिनी द एल्डर’ के अनुसार इन पात्रों की चित्रकारी इतनी यथार्थ थी कि पक्षी उन पर चित्रित अंगूरों को सही समझ कर खाने की कोशिश करते थे. कला के क्षेत्र में रोमन सभ्यता ग्रीक सभ्यता से प्रभावित थी इसलिए रोमन चित्रकारी काफी हद तक ग्रीक चित्रकारी से प्रभावित हुई. सही अर्थों में कहा जाए तो रोमन चित्रकारी की कोई अपनी विशेषता नहीं है. युद्धप्रिय रोमन जाति को कला की सभी बारीकियां ग्रीकों से ही मिली. रोमन भित्ति चित्र आज भी दक्षिणी इटली में देखे जा सकते हैं.
मध्यकालीन शैली :
मध्यकाल में लगभग दसवीं शताब्दी तक प्रदर्शन कलाओं के लिए अन्धकार युग माना जाता है क्योंकि चर्च ने उसे प्रतिबन्ध कर दिया था लेकिन चित्रकला फली-फूली पर उसका कार्यक्षेत्र धर्म और चर्च ही रहा. कला में 330-1453 ई. के कालखंड को बाइजेंटाइन काल कहा जाता है इस दौरान बाइजेंटाइन कला ने रुढि़वादी ईसाई मूल्यों को व्यवहारिक या लौकिक पच्चीकारी या प्रतिमाओं के रूप में व्यक्त किया. बाइजेंटाइन कला की तुलना वर्तमान काल की अमूर्त कला से की जा सकती है. मध्यकाल के दौरान रोमांनेस्क्यू और गोथिक चर्चों को स्थापत्य और भित्ति चित्रों से अलंकृत किया गया. तत्कालीन भित्ति चित्रों में एक विशेष अपील दिखाई पड़ती है. बाइजेंटाइन स्थापत्य व वास्तुकला के प्रभाव से रोमांनेस्क्यू कला में पैनल चित्रकारी एक सामान्य चीज हो गई और उसका बहुत योगदान रहा. 13वीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते मध्यकालीन कला व गोथिक चित्रकारी यथार्थवादी हो गई. यथार्थवादी कला का सबसे ज्यादा प्रभाव इटली पर पड़ा. इस काल के चर्चों में अधिक खिड़कियां बनाई जाने लगीं और अलंकरण के लिए रंगीन स्टेन शीशों का प्रयोग किया जाने लगा. नोत्रे देम द पेरिस का चर्च इस शैली की प्रतिनिधि इमारत है.
नवजागरणकाल और सदाचारवाद :
नवजागरणकाल में आकर कलाओं पर जो धार्मिक नियंत्रण या प्रतिबन्ध था वह ख़त्म हुआ और मध्यकाल में उपेक्षित कला को उत्कृष्ट बनाने के लिए कलाकारों ने प्राचीन यूनानी और रोमन कलाओं की विशेषताओं का आश्रय लिया. इसी क्रम में डोनाटेल्ले, लिप्पी और बोटसेल्ली ने ग्रीक और रोमन स्थापत्यकला, साहित्य और चित्रकारी में लोगों की रुचि जगाई. फ्लोरेंस नवजागरण का केंद्रबिंदु था. इस काल के कलाकारों ने चित्रकारी के लिए तैलीय रंगों का आविष्कार किया. लियोनार्डो द विन्सी, माइकेलएंजिलो, राफेल, जिओवन्नी बेल्लिनी और टिटियन जैसे महान कलाकारों ने चित्रकारी को एक नया आयाम व ऊँचाई प्रदान की. इस काल की चित्रकारी में मानव शरीर को एक अलग अंदाज में चित्रित किया गया. हैंस हॉलबीन द यंगर, अल्ब्रेख्त ड्यूरर, लुकाच क्रेनाच, मैथियास ग्रेुनेवाल्ड औ्रर पीटर ब्रुगेल जैसे फ्लेमिश, डच और जर्मन चित्रकारों ने इतालवी चित्रकारों की अपेक्षा अधिक यथार्थवादी शैली का विकास किया.
उच्चनवजागरणकाल की शैली से एक कलात्मक शैली सदाचारवाद का विकास हुआ. रोमानो, पोंटार्मो और पर्मीजिआनिनो जैसे कालकारों ने नवजागरण काल की खोजों को अरूढ़ शैली में व्यक्त किया.
शास्त्रीयवाद :
नवजागरण काल के बाद, 17वीं शताब्दी की चित्रकारी में शास्त्रीयवाद मुख्य शैली थी जिसका मुख्य प्रभाव कैथोलिक देशों -  इटली व फ्रांस पर विशेष रूप से पड़ा. लॉरेन और पाऊस्सिन जैसे कलाकारों ने उत्तर सदाचारवादियों की शुष्कता के खिलाफ विद्रोह करते हुए उच्च नवजागरण काल के प्रकृतिवाद की ओर अपना रुख किया.
डच स्कूल :
नीदरलैंड में 17वीं शताब्दी के दौरान डच चित्रकारी का जन्म हुआ. वनहिक, हल्सन और रेम्ब्रां जैसे चित्रकारों ने शांत जीवन एवं प्रतिदिन के प्रसंगों का चित्रण किया. सादगी और सामान्य प्रसंगों का चित्रण ही इस शैली कि विशेषता है. 
नव्य-शास्त्रीयवाद :
18वीं शताब्दी में इटली और ग्रीक की प्राचीन सभ्यताओं के उत्खनन के बाद नव्य-शास्त्रीयवाद का उदय हुआ. नव्य-शास्त्रीयवादी चित्रकारों ने मुख्य रूप से रूमानियत और उदात्तता पर ध्यान दिया. डेविड और इन्ग्रेस इस शैली के प्रतिनिधि कलाकार थे.
रोमांसवाद :
कला में रोमांसवाद का उदय 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ और इसका प्रभाव 19वीं शताब्दी के मध्य तक रहा. फ्रांसिस्को डि गोया, जॉन कांस्टेबल और जे. एम. डब्ल्यू. टर्नर जैसे चित्रकारों ने ने रोमांसवाद का प्रतिनिधित्व किया. रोमांटिक चित्रकारों ने लैंडस्केप चित्रकारी को एक शैली का रूप दिया. मुख्य रूप से इस वाद के कलाकारों ने शास्त्रीयवाद और नव्य-शास्त्रीयवाद के सौंदर्यात्मक और नीतिवादी मूल्यों के खिलाफ विद्रोह करते हुए चित्रों में रूमानी भावनाओं की अभिव्यक्ति की.
यथार्थवाद :
यथार्थवाद का जन्म फ्रांस में हुआ और जल्दी ही पूरे यूरोप और अमेरिका में इसका प्रसार हो गया. कॉउरबेट और मिलेट ने रोमांसवाद की आत्मनिष्ठता एवं व्यक्तिवादिता के खिलाफ विद्रोह करते हुए प्रकृतिवादी शैली अपनाते हुए प्राकृतिक दृश्यों और सामान्य जीवन के चित्र उकेरे. चित्रकला में  में प्रकृतिवादी शैली ही यथार्थवादी शैली मानी जाती है. इस शैली का उत्कर्षकाल 1840-1880 ई. तक मानी जाती है.
प्रभाववाद :
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फ़्रांस के कुछ कलाकारों ने चित्रकला में नए ढंग के प्रयोग किया जिसे प्रभाववाद नाम दिया गया. वे चित्रकार पुरनी रूढ़ियों को तोड़ते हुए खुले में जाकर चित्रकारी करने लगे. नई तकनीक के प्रयोगों के साथ चित्रों में मद्धिम प्रकाश के प्रभाव पर ध्यान दिया गया और पारदर्शी रंगों के प्रयोग की उपेक्षा की गई. रेनॉयर और देगास ने अपनी प्रथम प्रभाववादी प्रदर्शनी का 1874 में पेरिस में आयोजन किया. इनके विषयों में लैंडस्केप और शहरी जीवन का चित्रण करना शामिल था. सिउरेट ने प्रभाववादियों के कार्य को आगे बढ़ाते हुए रंग के बिंदुओं वाली बिंदुचित्रकारी का विकास किया.
संकेतवाद :
संकेतवाद शैली का उदय 1880 के दशक में चित्रकारी में प्रकृतिवादी प्रवृत्तियों, भौतिकवादी मूल्यों और औद्योगिक क्रांति के प्रभावों खिलाफ हुआ. मोरियू और रेडॉन जैसे संकेतवादी चित्रकारों ने प्रभाववाद की प्राकृतिक बिम्बसृष्टि को खारिज करते हुए फंतासी और स्वप्नों की दुनिया में शरण ली.
आधुनिक काल :
1888 ई. से आधुनिक काल की शुरुआत मानी जाती है. 1844ई. में वान गाग, तुलोज लात्रोक, बोन्नार रूसो जैसे नए कलाकारों की प्रदर्शनियों से उत्तरप्रभावाद की शुरुआत होने के कारण इसे आधुनिककाल का प्रथम कला आन्दोलन समझा जाता है. लगभग सौ साल से अधिक के सफ़र में पश्चिमी चित्रकला का आधुनिक काल प्रभाववाद के अतिरिक्त जिन कला आन्दोलनों का साक्षी बना वे हैं : अभिव्यंजनावाद, घनवाद, अमूर्त कला, दादवाद, अतियथार्थवाद, एक्सन पेंटिंग, पॉप कला, आकृतिमूलक कला,ऑप और काइनेटिक कला, फोटो यथार्थवाद, ग्रेफिटी कला आदि.
औद्योगिक क्रांति, साम्राज्यवाद, व्यापार आदि कारणों से यूरोप और अमेरिका का संपर्क विश्व के अन्य देशों से हुआ। फलतः, संस्कृति का आदान-प्रदान हुआ. इस कारण से पश्चिमी चित्रकला पर अफ्रीकी कला, इस्लामिक कला, भारतीय कला, चीनी कला और जापानी कला का बहुत प्रभाव पड़ा है और इन देशों की कलाएँ भी उससे प्रभावित हुई हैं.

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

क्युबिज्म या घनवाद



अंग्रेजी के क्यूबिज्म (cubism) शब्द का हिंदी पर्याय घनवाद है. एक आन्दोलन के रूप में घनवाद का जन्म दरअसल प्रभाववाद की प्रतिक्रिया स्वरुप हुआ था. प्राख्यात कलाकार सेजां ने 15 अप्रैल 1904 को एक युवा चित्रकार को चिठ्ठी में लिखा कि प्रकृति को बेलनाकार, गोलाकार और शंकु रूप में देखना-समझना चाहिए. बाद में सेजां की प्रकृति में ज्यामितीय रूपाकारों की खोज की सोच ने पिकासो और बराक जैसे कलाकारों के माध्यम से इस कला आन्दोलन को जन्म देने में निर्णायक भूमिका निभाई.
घनवाद का मुख्य सरोकर रूपाकार की प्रस्तुति थी – किसी चीज को जैसे हम देखते हैं वैसे उसे सामने नहीं रखा गया, उसकी बनावट और स्पेस में उसका स्थान अधिक महत्वपूर्ण हो गया. यानि एक ही कैनवास या कागज पर एक ही चीज के कई रूपों को प्रस्तुत किया गया. जाहिर है कि परिप्रेक्ष्य के सिद्धांतों को अस्वीकृत किया गया. रंगों की तुलना में रूपाकारों पर अधिक बल दिया गया.
कला समीक्षक लुई वाँसेल ने 1908 में बराक की एक पेंटिंग की चर्चा करते समय ‘घन’(cube) शब्द का इस्तेमाल किया जिसने घनवाद (cubism) नाम की नींव डाली. अंग्रेजी कला इतिहासकार डगलस कूपर ने अपनी मौलिक पुस्तक द क्यूबिस्ट ईपक में क्युबिज़्म के तीन चरणों का वर्णन किया है। कूपर के अनुसार "प्रारंभिक क्युबिज़्म" 1906 से 1908 तक था जब शुरूआत में पिकासो और बराक के स्टूडियो में आंदोलन विकसित किया गया था. दूसरे चरण को "उच्च क्युबिज़्म" कहा जाता है और 1909 से 1914 तक माना जाता है, जिस दौरान जुआन ग्रिस महत्वपूर्ण प्रतिपादक के रूप में उभरे. आखिर में कूपर ने "अंतिम क्युबिज़्म", 1914 से 1921 तक, को कट्टरपंथी नव-विचारक कला आंदोलन यानि क्युबिज्म का आखिरी चरण कहा है.
पाब्लो पिकासो और बराक घनवाद के दो सबसे बड़े कलाकार थे. दोनों ने कुछ समय तक घनवादी चित्र बनाये.1907 में पिकासो ने अपना एतिहासिक चित्र बनाया- ‘आविन्यों की स्त्रियाँ. इस चित्र ने घनवाद को कला आन्दोलन का रास्ता दिखाया. इस पेंटिंग में आदिम कला (खास तौर पर अफ्रीकी कला) से कई चीजें सीखी गई थीं. विषय को सरल ज्यामितीय आकारों में बदल दिया गया था. बाद में अनेक घनवादी कलाकारों ने नीग्रो कला से नई प्रेरणा प्राप्त करने की कोशिश की. घनवाद की बुनियादी सोच यही थी कि कलाकारों को तीन आयामों में जो दिखे उसे एक सपाट सतह पर पूरी तरह से कैसे दिखाया जाए.
अक्सर घनवाद और अमूर्त कला में घालमेल कर दिया जाता है. यह समझा जाता है घनवादी चित्रकार अमूर्तन में दिलचस्पी लेता है और विषय की उपेक्षा करता है. लेकिन स्तिथि इसके विपरीत है. घनवादी चित्रकार तो चीजों को पेंट करना चाहते थे. पर एक कोण से नहीं.
घनवाद के प्रारम्भिक चरण, 1907 से 1912 में चीजों के रूपाकारों के विश्लेषण पर जोर दिया गया था. उसे विश्लेषणात्मक घनवाद कहा जाता है. 1912 के आस पास पिकासो, बराक और जुआन ग्रीस ने कोलाज का इस्तेमाल शुरू किया. अख़बारों से लेकर रेल के टिकटों के टुकड़े कोलाज का हिस्सा बने. इसे विश्लेषणात्मक घनवाद का नाम दिया गया. यह प्रवृति 1915 तक प्रबल रही. विश्लेष्णात्मक घनवाद को भी दो हिस्सों में देखा जा सकता है. 1907-09 में सेजां का प्रभाव प्रबल था और 1909-12 में विश्लेषणात्मक खोजों पर जोर दिया गया.
घनवाद के प्रारंभिक दौर में गिटार, शराब का गिलास, बोतल, अख़बार, मेज जैसी चीजों को न जाने कितने कोणों से देखा गया और एकवर्णी चित्रण को प्राथमिकता मिली. एक एकवर्णी योजना में अक्सर नीले, भूरे और गेरू रंग शामिल होते थे. बाद में कलाकारों को महसूस हुआ कि रूपाकार को सपाट करते चले जाने से चीजें यथार्थ से दूर होती चली जा रही है. घनवाद बुनियादी रूप से एक यथार्थवादी कला आन्दोलन था इसलिए चित्र जब यथार्थ से बहुत दूर होने लगे, तो उन्हें यथार्थ के नजदीक लाने की कोशिश शुरू हुई. इसलिए धीरे धीरे वास्तविक सामग्री और  वर्ण विविधता का उपयोग किया जाने लगा.
घनवादी कलाकारों का रास्ता बाद में भले ही अलग हो गया पर इस कला आन्दोलन ने उन्हें पेंटिंग की एक ऐसी समझ दी जो दूसरे चित्रों के जन्म के लिए जरुरी थी. पिकासो ने बाद में न जाने कितने चित्रों में इस समझ का सार्थक इस्तेमाल किया.
शुरू में घनवादी चित्रों को लोग पसंद नहीं करते थे. कला समीक्षक मजाक उड़ाते थे. घनवाद के प्रारंभिक चरण में किसी ने पिकासो से पूछा कि अगर आप बारसेलोना (स्पेन) स्टेशन पर उतरें और आप के माता-पिता आपको घनवादी पेंटिंग सरीखे चेहरों के साथ घिरा देखें, तो वे क्या सोचेंगे ? इस पर एक कला समीक्षक ने कहा पिकासो से यह सवाल किया जाना चाहिए कि वे अपनी पेंटिंग की किसी स्त्री का साथ चाहेंगे या वीनस का ? ऐसे तमाम व्यंग-विरोधों के वावजूद  बहुत जल्दी ही पश्चिम का वातावरण घनवादी हो गया. ऐसा व्यापक असर पड़ा कि आधुनिक डिजाईन, स्थापत्य और नगर योजनाएँ – सभी कुछ घनवादी क्रांति से प्रेरित होने लगा.
घनवाद ने 6-7 सालों में ही पेंटिंग की धारणा में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया. रेनेसाँ के बाद से पेंटिंग की जो धारणा बन गई थी वह घनवादियों द्वारा तोड़ दी गई. प्रकृति के दर्पण के रूप में कला की धारणा पुरानी पड़ गई. कलाकार का बड़ा और जीनियस होने की मान्यता उसकी घनवादी छवि तय करने लगी. बराक और पिकासो भी अपने घनवादी दौर को कभी पार नहीं कर पाए. उनकी उत्कृष्टता भी घनवाद से सम्बंधित रही और उनका बाद का बहुत-सा काम घनवादी दौर की तुलना में घटिया माना गया.     
फ्रांसीसी कवि वालेरी की शिकायत थी कि घनवाद के पहले दशक में एक पेंटर का काम दूसरे पेंटर से अलग करना मुश्किल था. इस पर समीक्षक वोल्फगांग पालेन ने कहा है, “इससे यह साबित होता है कि घनवाद ने एक सामूहिक रास्ता अपना लिया था. एक महान अज्ञात व्यक्तित्व बन गया था. पेंटिंग, संगीत की बहन ज्यामिति की दुनिया में चली गई थी”.
घनवाद में चित्रकला का सबंध सिर्फ ज्यामिति से ही नहीं बल्कि कविता से भी रहा. घनवाद की मौलिकता का गहरा संबंध उस दौर की अवाँ गार्द कविता से था. पिकासो ने खुद स्वीकार किया है - “वह एक ऐसा वक्ता था जब कवियों और चित्रकारों ने एक-दूसरे को प्रभावित किया”. तत्कालीन प्रतिभाशाली फ़्रांसिसी कवि एपोलीनियर ने घनवादियों की पहली प्रदर्शनी के कैटलॉग में प्रभाववाद पर हमला करते हुए लिखा – “अब एक ऐसी काल के लिए जगह है जो अधिक परिष्कृत, अधिक संयोजित, अधिक प्रभावशाली है”. दरअसल एपोलिनिएर की प्रतिभा, उनकी बौद्धिक क्षमताओं, रचनात्मक उर्जा ने घनवाद का ऐतिहासिक साथ दिया. कवि पियारे रेवेर्दी ने कहा कि दर्शन के क्षेत्र में देकार्ते ने जो किया वही पिकासो ने अनजाने में पेन्टिंग में किया.
पिकासो, बराक और ग्रीस के बाद घनवाद को नए अर्थ और सन्दर्भ देनेवाले चार कलाकार थे - देलोने, लेझे, पिकाविया और मार्सेल दुसाँ. इन चारों ने घनवाद को नए अर्थ और सन्दर्भ दिए. इन कलाकारों ने घनवाद से अपना कार्य शुरू करके, घनवाद और भविष्यवाद[1] के रास्ते और भाषा में काफी भिन्नता के वावजूद, अपनी कला में भविष्यवाद के लक्षणों को प्रश्रय दिया. लेझे ने भविष्यवादियों की तरह अपनी कला में मशीनी पुर्जों का स्वागत किया. इसलिए उनकी कृतियों के सन्दर्भ में ‘ट्यूबवाद’ और ‘सिलिंडरवाद’ जैसे नामों का उपयोग किया जाने लगा. 1917 में बनाई गई उनकी पेंटिंग ‘ताश का खेल’ घनवादी भाषा से प्रारम्भ होकर उससे परे चली जाती है. इस तरह चित्रकला घनवाद से दूसरी ओर मुड़ने लगी.
वर्तमान समय में घनवाद या क्यूबिज्म एक कला आंदोलन से बहुत दूर कला के इतिहास के पूर्व वृतान्तों तक सीमित रहकर भी अनेक समकालीन कलाकारों को अपनी परंपरा और काम की बारीकियों की जानकारी देकर प्रेरित करती है. इसलिए घनवादी चित्रकारी का केवल नियमित वाणिज्यिक उपयोग ही नहीं होता है बल्कि समकालीन कलाकारों की उल्लेखनीय संख्या, आज भी शैलीगत ढंग से और सैद्धांतिक रूप से भी चित्र बनाती है. एक प्रतिनिधी सम्प्रदाय के रूप में घनवाद, चित्रकला में फोटोग्राफी के लगातार बढ़ते महत्व और उसकी जकड़ में आने वाले कलाकारों को प्रेरित करके चित्रकला को फोटोग्राफी से आगे ले जाने में पूरी तरह से मदद करता है. पर कुछ प्रश्न जो 20 वीं सदी के आरम्भ में घनवाद के प्रतिनिधी कलाकारों के समक्ष उठे थे वे आज भी अनुत्तरित ही हैं. उन प्रश्नों में सौंदर्य संबंधी प्रश्न भी हैं.


[1] इतालवी लेखक मरिनेती ने 1909 में काव्यात्मक, कलात्मक और राजनितिक आन्दोलन – ‘भविष्यवाद’ नाम से शुरू किया था. भविष्यवाद ने आदमी और मशीन के सम्बन्ध को जांचने कि भी कोशिश की.

पिकासो व्यक्तित्व और कार्य



आधुनिक पश्चिमी चित्रकला की शुरुआत विन्सेन्ट वॉन गॉग, पॉल सिजैन, पॉल गॉगुइन, जॉर्जेस श्योरा और हेनरी डी टूलूज लॉट्रेक जैसे ऐतिहासिक चित्रकारों ने की. इन सभी ने आधुनिक कला के विकास में  महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. 20वीं सदी की शुरुआत में हेनरी मैटिस और कई युवा कलाकारों, जिनमें पूर्व-घनवादी जॉर्जेस ब्रैक्यू, आंद्रे डेरैन, रॉल डफी और मौरिस डी व्लामिंक शामिल थे, इनके जीवंत बहु-रंगी, भावनात्मक परिदृश्य और आकार से संवलित चित्रकला जिसे आलोचकों ने फॉविज्म का नाम दिया, ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई . लेकिन इन सब के बीच बीसवीं सदी का आरंभ एक ऐसे चित्रकार के आगमन से होता है जिसने चित्रकला के नए सौंदर्शस्त्रीय प्रतिमान स्थापित किए. वह चित्रकार थे पाब्लो पिकासो. अवध नारायण कहते हैं कि ‘20वीं सदी के सौंदर्यशास्त्र का आरंभ ही पिकासो से होता है.’ (कला दर्शन : अवध नारायण)

पाब्लो पिकासो का जन्म स्पेन के मलागा शहर में 1881 ई. में हुआ. चित्रकला का हुनर पिकासो को अपने पिता से मिला. उनके पिता चित्रकला के अध्यापक थे. इसलिए कला की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें अपने पिता से मिली. पिकासो की कला प्रतिभा से प्रभावित होकर उनके पिता ने अपना ब्रश 14 वर्ष की आयु में ही उन्हें सौंप दिया और खुद चित्रकारी छोड़ दी. पिकासो ने इसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया और फिर कला के क्षेत्र में पीछे मुड़ कर नहीं देखा. इस तरह के अद्वितीय प्रोत्साहन के वावजूद चित्रकला के क्षेत्र में पिकासो ने अपने पिता से अलग रास्ता चुना. फिर भी पिता का प्रभाव पिकासो पर था. वह स्वयं लिखते हैं  है कि “मैं जब-जब पुरुष का चित्र बनाता हूँ, तब-तब मुझे पिता कि याद आती है. पुरुष अर्थात डॉन ज़ोजे ... यह समीकरण जैसे मेरे दिमाग में पक्का बन बैठा है, मैं जिस पुरुष की रेखाकृति बनाता हूँ, उन सब में बहुत कुछ उन्हीं की रेखा आ जाती है”. शुरूआती दौर में पिकासो का चहेता मॉडल कबूतर था. जिसको लेकर उन्होंने आरंभ में कई आकृतियाँ बनाई.

चित्रकला के क्षेत्र में पिकासो का सबसे मत्वपूर्ण कार्य यह है कि उसने चीजों को देखने का ढंग ही बदल दिया. ‘दम्वाज़ेल’ पिकासो की ऐसी कलाकृति है जिसने परंपरागत मानव शरीर की कुलीनता व यथार्थ दर्शन जैसे मूल्यों को आघात पहुंचाया. स्टाइन ने लिखा भी कि “19वीं सदी का जो यथार्थ था, वह 20वीं सदी का नहीं हो सकता. चित्रकला के क्षेत्र में अकेले पिकासो ने इस बात का आकलन किया है . मातिस वगैरह की आंखें 20वीं सदी की हैं,जबकि उनकी दृष्टि अभी भी 19वीं सदी की हैं . पिकासो इस मायने में अकेला है. उसका संघर्ष भयानक है ..... उसकी सहायता के लिए कोई नहीं आता, न भूतकाल न वर्तमान. वह समय से आगे नहीं है, वह अपना यथार्थ जी रहा है.” (पिकासो जीवनी: माधुरी पुरंदरे, पृ. 89)

पिकासो की चित्रकला में पेरिस का अहम योगदान है. पेरिस उस समय कला का केंद्र था. हर कलाकार का मन पेरिस में ही रमता था. 1900 के आस-पास पिकासो भी कुछ समय के लिए पेरिस गए. अपने पेरिस प्रवास में वह कई कलाकारों से मिले और उनकी कला में महत्वपूर्ण बदलाव आया. पेरिस में ही पिकासो ने नील युग और गुलाबी युग की शुरुआत की. नीले कालखंड में उनका एक सूत्र वाक्य था कि “दुख से चिंतन का जन्म होता है और वेदना जीवन की  सतह है”. इस काल में उसके चित्रों में नीले रंग ही दिखाई देते थे इसलिए इसे नील कालखंड कहा गया. उसने नीले रंग से यथार्थ व करुणा को अभिव्यक्त किया. रात्रि की नीलिमा, दिन का नीलापन, आकाश का नीलापन, चेहरे की  बेचैनी का नीलापन, इन सब को उन्होंने विविध आयामों में चित्रित किया. पिकासो ने नीले रंग में क्यों चित्र बनाए इसका उत्तर किसी के पास नहीं था लेकिन एक बार स्वयं पिकासो ने कहा “कज़ागमास अब इस दुनिया में नहीं रहा”. जिसका अर्थ है कि यह नीलिमा उसकी वेदना की नीलिमा थी. नीला काल खंड खत्म होने के बाद गुलाबी युग की शुरुआत होती है जिसका पहला चित्र था ‘द एक्टर’. लेकिन इन दोनों कालखंडों के चित्रों में कोई समानता नहीं थी. नीला कालखंड किसी स्तर तक कठोर और निर्मम था वहीं गुलाबी युग में चित्र चमक उठे थे. इस युग में करुणा के विषय भिखारी, कंगाल, यतीम बालक, लिजलिजे बूढ़े आदि कम होने लगे. उनकी जगह सर्कस कलाकार, उनके खेल, उनके विचित्र कपड़े, उनके परिवार, भांड, मसखरे आदि विषयों ने ले लिए. यह दौर कला के लिए उत्कृष्ट दौर था. वर्ष 1906 में उन्होंने अपनी सुप्रसिद्ध कलाकृति ‘एविगनन की महिलाएं’ बनानी शुरू की. उन्होंने इस चित्र को लगभग एक वर्ष में पूरा किया.

कला के इतिहास में पुनर्जागरण काल के बाद चित्रकला का तात्पर्य यथार्थ के वास्तविक प्रतिबिंब से लिया जाने लगा. किसी ऐतिहासिक घटना का कलात्मक, आलंकारिक चित्रांकन अथवा धार्मिक या पौराणिक मिथिकों पर चित्रनिर्मिति आदि बड़े पैमाने पर हो रहा था. 19वीं सदी के मध्य में चित्रकला का रुझान किसी दृश्य की छाया की तरह प्रतिबिंबात्मक चित्र बनाने की ओर रहा. चित्र एक ऐसा झरोखा बन गया था, जिसमें से देखने पर वस्तुएँ, व्यक्ति और दृश्य इस तरह दिखाई देने लगे थे जैसे रंगमंच पर अवतरित हो रहे हों. इस तरह की चित्रकला पर पिकासो ने सोच-विचार किया और वह इस तथ्य पर पहुंचे कि हमारी आँखों के सामने जो दृश्य मौजूद है, उसे देखने में समर्थ होते हुए भी उसे पुनः कैनवास पर हू-ब-हू क्यों उतारा जाए? और वैसे भी कोई चित्रकार अपने चित्र में हू-ब-हू वैसा ही प्रतिबिंब नहीं उतार सकता. पिकासो की इसी सोच से 1909 ई. में क्यूबिज़्म का जन्म हुआ. क्यूबिज़्म का उदगम किसी वस्तु के प्रतिबिंब की तरह मूर्ति बनाने की कल्पना के विरुद्ध, विद्रोह से हुआ. अपनी भावना, अपना विचार और अपनी संवेदना को अधिकाधिक तीव्रता से व्यक्त करना ही वक़्त की मांग थी. कला की हर विधा में मंथन चल रहा था और अब आकृतिबंध, रंग-रेखा, प्रकाश, अवकाश, पृष्ठभाग की पीठिका, उपयोग की वस्तुएं, उनका प्रतीक और वस्तुस्थिति से प्रकट अर्थ आदि पहले की तरह नहीं रहे थे.

इस आंदोलन की शुरुआत ‘नीग्रो कला’ से हुई. इसने कला के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किया. इसमें कला के परंपरागत ढांचे को तोड़ा गया और चीज़ों को नए संदर्भों में विश्लेषित किया गया. कला के इतिहास में खासकर 18वीं और 19वीं सदी में जो कुछ रचा गया, उसका अगला पायदान क्यूबिज़्म ही था. पिकासो की जीवनी में माधुरी पुरंदरे क्यूबिज़्म के बारे में लिखती हैं कि “वैचारिक जगत में आइंस्टाइन और फ्रयाड के सिद्धांत की जितनी महत्ता है, पाश्चात कला-क्षेत्र में क्यूबिज़्म भी उतना ही महत्वपूर्ण है”. लेकिन क्यूबिज़्म के तहत जो कुछ हुआ वह इतना सघन और समय से आगे था कि कला का पूरी तौर पर कायापलट ही हो गया. कतिपय समीक्षकों की यह मान्यता है कि 15वीं सदी से प्रस्थापित कला की परंपरा को क्यूबिज़्म ने ध्वस्त कर दिया. इसका यह अर्थ नहीं है कि पिकासो या अन्य क्यूबिस्ट चित्रकार ने परंपरा से इंकार किया हो. इन लोगों ने सिर्फ इतना किया कि परंपरा को समझे, परखे बिना उसे ज्यों का त्यों नहीं अपनाया.

उत्कृष्टता के मायने में पिकासो की  चित्रकला 1907 -1913 के बीच चरम पर थी जब वे घनवाद के प्रभाव में थे. घनवादी प्रभाव में मिली लोकप्रियता इतनी व्यापक हुई कि बाद के वर्षों में घनवाद के प्रभाव से मुक्त होने और कलात्मक उत्कृष्टता के आभाव के वावजूद उनके चित्र बहुत मंहगे बिकते थे. सिर्फ एक चित्र बेचकर ही एक बंगला खरीदा जा सकता था. एक समय ऐसा भी था जब वे सिर्फ हस्ताक्षर करके पैसा कमा सकते थे. हालाँकि तब कला बाजार में इस लूट के कारण अमेरिकी और यूरोपीय समाज में दूसरे तरह का विकास भी था. पर पिकासो की लोकप्रियता निर्विवाद थी. सच तो यह है कि कला की दुनिया और प्रचार के साधनों ने उन्हें ईश्वर का दर्जा दे दिया था.

घनवादी प्रभाव के बाद उनकी कला में फिर वैसी उत्कृष्टता 1932-42 दशक में आ सकी. पर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पिकासो की कला में फिर से ह्रास होने लगा. विषयों के आभाव के कारण वे पुराने समय की चर्चित कलाकृतियों का अनुकरण करने लगे पर वे इन कलाकृतियों में न तो कुछ नया जोड़ पाए और न ही नई व्यख्या कर पाए. इन कमियों के वावजूद भी वे जीवन के अंतिम वर्ष (1973) तक चित्रकारी करते रहे और प्रतिष्ठा पाते रहे. दरअसल पिकासो ने इतनी अधिक और इतने तरह के चित्र बनाये हैं कि उन्हें महान कलाकार मानने के लिए विवश होना पड़ता है. क्युबिज्म का श्रेय तो उन्हें है ही बल्कि बाद के वर्षों में भी ‘गेर्निका’ जैसे अद्भुत चित्र का भी गौरव प्राप्त है. वास्तव में, पिकासो चित्रकला के इतिहास में प्रतिभा और सौभाग्य का संयोग वाले अद्वितीय कलाकार थे.           

पिकासो के प्रसिद्ध चित्र हैं – मूल द ला गालेत, (प्रथम चित्र ) द डार्फ वूमेन, द लाइफ, द एक्टर, सस्ता भोजन , दम्वाज़ेल, (मानव शरीर का विकृत चित्र), आलिंगन (खड़िया मिट्टी से बना चित्र) आदि.