शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

आधुनिक पश्चिमी चित्रकला : विभिन्न आन्दोलन


आधुनिक पश्चिमी चित्रकला में निम्नलिखित आंदोलन महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
उत्तर प्रभाववाद :
1874 में प्रभाववाद की शुरुआत हुई थी. क्लोद मोने जैसे कलाकार के नया रास्ता दिखाया था. कलाकार अपने साजोसामान के साथ खुले में जाकर प्रकृति व जीवन के विभिन्न रूपों को नए तकनीक व नई रंग योजना के साथ प्रकाश-छाया के बारीक प्रभावों को चित्रों में अंकित करने लगे थे. प्रभाववाद के इन्हीं विशेषताओं के साथ कुछ नया प्रयोग करते हुए वान गाग, तूलोज लात्रेक, बोन्नार, रूसो जैसे नए जमात के कलाकारों ने 1884 में प्रदर्शनियां लगाई, यहीं से उत्तर प्रभाववाद की शुरुआत मानी जाती है. 1888 ई. से इतिहासकारों ने चित्रकला में आधुनिक कला माना है तब उत्तर प्रभाववादी प्रवृति चित्रकला के केंद्र में थी इसलिए इसे आधुनिककाल का पहला कला आन्दोलन माना जाता है.
वान गाग ने प्रभाववादी विशेषताओं के आलोक में नए तरह के विषय चित्रित किए. प्रकृति कि बहुत ही आत्मीय पहचान रखते हुए भी उन्होंने अपने चित्रों में गरीबों के दुख-तकलीफों को स्थान दिया. प्याज जैसी छोटी चीजों को उन्होंने कैनवास पर जगह दी. आलू खाते हुए लोगों की पेंटिंग उनकी उत्कृष्ट रचना मानी जाती है. सूर्य से गहरे जुड़कर भी उन्होंने धार्मिक चित्र नही बनाए. दुर्भाग्यवश 1888 उनकी विक्षिप्तता शुरू हुई जिससे उबकर भरी आर्थिक तंगी की स्थिति में उन्होंने 1890 में खुद को गोली मार ली. एक महान कलाकार का त्रासद अंत हो गया.
प्रभाववाद के प्रतिनिधि कलाकार सेजां भी इसी काल में प्रभाववाद के प्रभामंडल से निकले और वस्तुओं को ज्यामितीय संरचना के आधार पर देखने-परखने लगे. उनकी इसी दृष्टि का आधार लेकर बाद में पिकासो, बराक, ग्रीसो आदि ने घनवाद को स्थापित किया.
रूसो ने जादुई यथार्वाद से सपने जैसी दुनियाँ रचाने लगे जिसे उनके परवर्ती घनवादियों, अभिव्यंजनावादियों और अतियथार्थवादियों सभी ने स्वीकारा. मातीस का नाम फाववाद[1] से जुड़ा. ऐसे ही अन्य उल्लेखनीय परिवर्तनों के कारण उत्तर प्रभाववाद आधुनिक काल में  परिवर्तनों का अग्रदूत कला आन्दोलन माना जाता है.                              
अभिव्यंजनावाद :
अभिव्यंजनावाद एक ऐसा कला आन्दोलन था जिसमें विचार की अपेक्षा भावनाओं पर अधिक जोड़ दिया जाता था. कलाकार अक्सर ऐसे विषय चुनते थे जो प्रेक्षकों में तीव्र भावनाएं जागते थे. जैसे – मृत्यु, दुःख, वेदना यंत्रणा आदि. ऐसे विषय के कारण चित्रों में रेखाओं के बदले रंगों का महत्व बढ़ गया. प्रभाववाद का विरोध करने वाले ऐसी प्रवृति वाली आधुनिक कलाओं के लिए जर्मन समीक्षक वाल्डेन ने ‘अभिव्यंजनावाद’ नाम का उपयोग किया था. बाद में यह नाम वैसी कलाओं के लिए रूढ़ हो गया जिसमें कलाकार यथार्थ की तुलना में यथार्थ के प्रति निजी प्रतिक्रिया ज्यादा देते थे और भावनाएं, संवेग, रंग-रूपाकार आदि के माध्यम से एक अलग तरह का यथार्थ रचते थे.
नार्वे के कलाकार एडवर्ड मुंच ने 1989 में लिखा था “हमें पढ़ते हुए आदमियों और बुनाई करती हुई औरतों की तस्वीरें बनानी बंद कर देनी चाहिए. हमें उन जीवित लोगों के चित्र बनाने हैं जो साँस लेते हैं, दुखी हैं, भावुक हैं, प्रेम करते हैं”. 1894 में उन्होंने एक पेंटिंग बनाई – चीख. अकेली यही पेंटिंग अभिव्यंजनावाद की सभी विशेषताओं को बता देती है.
मानव सभ्यताओं की तकलीफों से जुड़ा होने के कारण अभिव्यंजनावाद का गहरा सम्बन्ध साम्यवाद से भी रहा. इसके माध्यम से कला में आंतरिक उद्वेगों और भवतिरेकों की विस्फोटक अभिव्यक्ति आदमी को बेहतर जीवन का सपना दिखाती थी.
अभिव्यंजनावाद से जुड़े प्रमुख कलाकार थे, बेल्जियम के जेम्स एन्सर, वियना के आस्कर कोकोश्का; जर्मनी में अभिव्यन्जनावादियों की टोलियाँ थी जिनमें प्रमुख कलाकार थे : नेल्डे, मस्क बेकमन्न, मार्क शागाल, गेओर्ग ग्रास्त्स आदि. द्वितीय विश्वयुद्ध ने अभिव्यंजनावाद को बहुत क्षति पहुँचाया. कहते हैं नाजियों ने अभिव्यंजनावाद की ह्त्या कर दी.   
कला में अभिव्यंजनावादी मिजाज कोई नई चीज नहीं थी बल्कि सभी संस्कृतियों और युगों में इसे खोजा और पहचाना जा सकता है. यह एक निश्चित समय में शुरू और ख़त्म नहीं हो गया फिर भी आधुनिक कला के इतिहास में अभिव्यंजनावाद की एक खास पहचान बनी.     
 घनवाद :
1907 में पाबलो पिकासो ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘च्लेस डिमॉयसेलेस डि एविग्नॉनज्’ का प्रदर्शन पेरिस में किया जिससे क्यूबिस्ट आंदोलन की आधारशिला रखी गई. यह शैली इस मायने में अनूठी थी कि इसने पारंपरिक प्राकृतिकवादी चित्रण और सौंदर्यात्मक मूल्यों के खिलाफ पूरी तरह से विद्रोह कर दिया. इस शैली में सेजाँ की प्रेरणानुसार वस्तुओं को गोले, बेलनों और शंकुओं के संयोजन से गठित होने की दृष्टि से देखा जाता है. पिकासो के अतिरिक्त इसे स्थापित करनेवाले कलाकारों में बराक और जुआन ग्रीस को माना जाना है.  
अमूर्त कला :
आधुनिक काल के कला इतिहास में 1910 का विशेष महत्त्व है. क्योंकि यह माना जाता है कि इसी साल अमूर्त कला का जन्म हुआ. यह अलग बात है कि अमूर्त कला तब से है जब से मनुष्य ने गुफ़ाओं में चित्र बनाना शुरू किया. शब्दकोश की परिभाषा के मुताबिक़ एक शुद्ध अमूर्त चित्र वह है जो प्राकृतिक जीवन से पूरी तरह से स्वतंत्र होता है, भले ही उसकी जगह प्रकृति में हो. इस तरह की कलाकृति को एक स्वतंत्र वस्तु समझा जाता है और उसमें किसी विषय को खोजना व्यर्थ होता है. किसी भी विचारों की खोज से परे रेखाओं और रंग-रूपाकारों का संयोजन उसी तरह सुख देता है जो संगीत सुनने से मिलाता है.
कान्दिस्की और मोंद्रियाँ ने अमूर्त कला को एक कलाआंदोलन में बदल दिया. दरअसल प्रभावादियों से लेकर घनवादियों तक ने अमूर्त कला के लिए रास्ता बनाया. इस आंदोलन के एक प्रमुख नाम कासीमीर मलेविच ने अमुर्तन को एक अलग विस्तार दिया. और जब नएपन के आभाव में उन्होंने पेंटिंग बंद किया तो यह कला आंदोलन तीव्रता से पतन की ओर उन्मुख हो गया. 
दादावाद :
प्रथम विश्व युद्ध के तुरंत बाद पश्चिम में, खासकर मुख्य यूरोप में, कलाकर्मियों की बुर्जुआ समाज के प्रति नफरत बढ़ गयी. कलाकृतिओं के दाम बढ़ने शुरू हुए तो कलाकर्मिओं ने ‘अकला’ को जन्म देकर इस समाज के प्रति गुस्सा दिखाया. इसी क्रम में स्थापित घनावाद को उन्होंने ‘गोबर का गिरजाघर’ कहा. पहले से स्थापित कला के सभी प्रतिमानों को तोड़ते हुए 1920 में जब जर्मनी के कोलोन  में शौचाल से जुड़ी जगह पर एक प्रदर्शनी लगाई गई जिसमे दर्शकों को कुल्हाड़ी दिया गया ताकि वे कला को तोड़-फोड़ सकें. दर्शकों ने ऐसा ही किया और इसी परिघटना से दादावाद पूर्णतः प्रकाश में आया.
दादावादिओं का जन्म भविष्यवादियों की मदद से हुआ इतिहासकार दादावाद के बीज 1913 से ही खोजना शुरू कर देते है. वस्तुतः दुशां, पिकाबिया, और मान रे में उन्हीं दिनों दादावादी प्रवित्तियां देखी गयी थी. 1917 में दादावादी कलादीर्घा खोली गयी. जिसमें कलाप्रेमी दर्शक को चित्रों की महत्ता पर भाषण सुनने के बजाय गाली-गलौज तक सुनने पड़े. वहाँ बुर्जुआ कला का हर तरह से माखौल उड़ाया जाता था. पेंटिंग के नाम पर दीवार पर बेतरतीब सफेदी पोती जाती थी और मौका पड़ने पर दर्शक भी सफेदी से नहीं बचते थे.
दादावाद के इस नकारावादी, निहलिस्ट, अराजकतावादी, निषेधी मिजाज ने बाद में 20 वीं शताब्दी के अनेक महत्वपूर्ण कलाकारों पर बुनियादी असर डाला जिससे अतियथार्तवाद का रास्ता तैयार हुआ. इसलिए दादावाद का ऐतिहासिक महत्त्व है.     
अतियथार्थवाद :
अपने नाम से यथार्थवाद के विकसित रूप का भ्रम उत्त्पन्न उत्त्पन्न करनेवाला अतियथार्थवाद, यथार्थवाद से पूर्णतःभिन्न कला आन्दोलन है. इसकी जड़ें दादावाद से जुड़ती है. 1922 में दादावाद का पतन हुआ और 1924 में फ़्रांसिसी कवि आंद्रे ब्रेटन ने अतियथार्थवाद को जन्म दिया. इस कला आन्दोलन में यह माना जाता है कि सामने जो दिखाई दे रहा है वह यथार्थ नहीं होता है बल्कि यथार्थ उसके परे होता है. कला माध्यमों से उसी आंतरिक यथार्थ को ढूँढने की कोशिश की जाती है जो विश्रिंखल और असंगत होता होता है. इसलिए इस आन्दोलन से प्रभावित कला में विसंगत उन्मुक्त कल्पना और और स्वचालित रचना प्रक्रिया की प्रधानता होती है. चीजों को सामान्य सन्दर्भों और अर्थों से मुक्त कर दिया जाता है.
सिगमंड फ़्राईड के विचारों ने अतियथार्थवादियों को काफी प्रभावित किया. अवचेतन में कलाकर्मियों कि दिलचस्पी बढ़ गयी. मानसिकता का बाहरी हिस्सा आईसबर्ग की तरह समझा गया जो पानी के बाहर कम और अन्दर बहुत अधिक होता है. आंद्रे ब्रेटन ने 1925 में अतियथार्थवाद को साम्यवाद से जोड़ने का प्रयास किया पर उसे सफलता नहीं मिली. अनेक कलाकारों का वामपंथी रूझान था पर साम्यवादी पार्टी ने इस आन्दोलन में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.         
प्रमुख यथार्थवादी चित्रकार थे जेयोर्जियो द किरको, साल्वाडोर डाली हुआन मेरो, मक्स अर्न्स्ट आदि. किरको ने अपने चित्रों में साफ़–सुथरी रेखाओं, ज्यमीतिय रूपों, उजाड़ जगहों, लम्बी छायाओं के माध्यम से एक जादुई रहस्य की सृष्टि की है. डाली सर्वाधिक लोकप्रिय यथार्थवादी कलाकार हैं जिनकी पिघली हुई मुलायम घडियां अतियथार्थवाद की पहचान बन चुकी हैं. मेरो भूख का विभ्रम रचने के लिए जाने जाते हैं तो हुआन के चित्रों में तितलियाँ ड्रैगन में बदल जाती हैं.
एक कला आन्दोलन के रूप में अतियथार्थवाद लम्बे समय तक जीवित नहीं रहा पर उसने चित्रकला, मूर्तिशिल्प, साहित्य, नाटक, फिल्म और संगीत सभी को प्रभावित किया. पर स्थापत्य को प्रभावित नहीं कर सका. बीसवीं शताब्दी का विज्ञापन जगत अतियथार्थवादी कला का भरपूर उपयोग किया. वर्त्तमान समय में भी यदा-कदा इस कला का प्रयोग अख़बारों, दुकानों आदि की सज्जा में दिखाई पड़ जाता है.   
पश्चिमी चित्रकला को प्रभावित करनेवाले उपरोक्त कला आन्दोलनों के अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण कला आन्दोलन हैं : एक्सन पेंटिंग, पॉप कला, आकृतिमूलक कला, ऑफ़ और काइनेटिक कला, फोटो यथार्थवाद, ग्रेफेटी शैली आदि. इन आन्दोलनों के प्रभाव में आकर भी अनेकों कलाकारों ने बहुत अधिक संख्यां में उल्लेखनीय चित्रों की रचना की हैं.


[1] 1905 में कुछ कलाकारों के काम को ‘जंगली जानवर का पिंजरा’ बताते हुए एक कला समीक्षक ने फाविज्म नाम को जन्म दिया था.

पश्चिमी चित्रकला का संक्षिप्त इतिहास



कला मानव मन की ऐसी रचनात्मक अभिव्यक्ति है जिसके माध्यम से वास्तविक और काल्पनिक स्थितियों को चित्रित किया जाता है. उसकी सुदंरता को कैनवास, पेपर, पत्थर और दीवारों पर उकेरा जाता है. आमतौर पर जब हम कला की बात करते हैं तब उसका अभिप्राय, वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला से होता है. कला विश्व की ऐसी कलात्मक और अनूठी पहचान है जिससे किसी भी देश की संस्कृति और सभ्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है. कला की कलात्मकता इससे परलक्षित होती है कि कलाकार और हस्तशिल्पी अपनी रचनात्मक अंगुलियों से वही दिखाता है जो वास्तव में सच होता है. कला को वास्तविक और मूर्त रूप कलाकारों की कल्पना ने दिया. जिन्होंने इसको दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा दिया. आधुनिक कला को हम मनुष्य की कलापूर्ण प्रवृत्ति का साक्षात् प्रमाण मानते है. जिसकी सुंदरता दुनिया के विभिन्न चित्रकारों ने अपनी कला से प्रकट की है. प्रकृति और कला का नाता बहुत ही प्राचीन है. इनका अस्तित्व ही मनुष्य को जीवंत बनाए हुए है. कला की उत्पत्ति के चिन्ह हमें गुफाओं और शिलाखण्डों पर उकरी गई विशेष आकृति में देखने को मिलते हैं. इसलिए चित्रकला को ही सबसे प्राचीन कला मानना तर्क संगत लगता है.
विश्व के विभिन्न भागों में गुफाओं आदि से प्राप्त चित्रित आकृतिओं का तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद भी चित्रकला की उत्पत्ति कब हुई, इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है, निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है क्योंकि अब तक मिले साक्ष्य अंतिम साक्ष्य नहीं हैं. वर्तमान समय में यह माना जाता है कि 27000-13000 ई.पू. में दक्षिण-पश्चिम यूरोप में गुफा कला के द्वारा तत्कालीन मानव ने अपने जीवन का चित्रण किया और वहीं से पश्चिमी कला की शुरुआत. भारत की तरह पश्चिम में चित्रकला की उत्पत्ति का कोई दैवी सिद्धांत (भारत में राजा नग्नजित का प्रसंग) मान्य नहीं हैं. वहां चित्रकला की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धांत ही मान्य है. प्रागैतिहासिक काल के बाद पश्चिम में चित्रकला की ठोस जानकारी प्राचीन गौरवशाली ग्रीक युग से मिलती है. ग्रीक चित्रकला बहुत उत्कृष्ट थी जिससे रोमन प्रभावित हुए. इसी तरह क्रमिक युगों में अपनी पूर्ववर्ती कला, स्थितिओं, विचारधाराओं या वादों से प्रभावित होकर पश्चिमी चित्रकला आगे बढ़ी जिसका क्रमबद्ध वर्णन निम्नप्रकार है.
प्राचीन रोमन व ग्रीक चित्रकला :
प्राचीन ग्रीक संस्कृति ज्ञान-विज्ञान-राजनीति और नाट्यकला की तरह ही  दृश्य कला (visual art) यानि चित्रकला और मूर्तिकला के क्षेत्र में भी अपने आसाधारण योगदान के लिए विख्यात है. प्राचीन ग्रीक चित्रकारी मुख्यतया अलंकृत पात्रों के रूप में मिली है. ‘प्लिनी द एल्डर’ के अनुसार इन पात्रों की चित्रकारी इतनी यथार्थ थी कि पक्षी उन पर चित्रित अंगूरों को सही समझ कर खाने की कोशिश करते थे. कला के क्षेत्र में रोमन सभ्यता ग्रीक सभ्यता से प्रभावित थी इसलिए रोमन चित्रकारी काफी हद तक ग्रीक चित्रकारी से प्रभावित हुई. सही अर्थों में कहा जाए तो रोमन चित्रकारी की कोई अपनी विशेषता नहीं है. युद्धप्रिय रोमन जाति को कला की सभी बारीकियां ग्रीकों से ही मिली. रोमन भित्ति चित्र आज भी दक्षिणी इटली में देखे जा सकते हैं.
मध्यकालीन शैली :
मध्यकाल में लगभग दसवीं शताब्दी तक प्रदर्शन कलाओं के लिए अन्धकार युग माना जाता है क्योंकि चर्च ने उसे प्रतिबन्ध कर दिया था लेकिन चित्रकला फली-फूली पर उसका कार्यक्षेत्र धर्म और चर्च ही रहा. कला में 330-1453 ई. के कालखंड को बाइजेंटाइन काल कहा जाता है इस दौरान बाइजेंटाइन कला ने रुढि़वादी ईसाई मूल्यों को व्यवहारिक या लौकिक पच्चीकारी या प्रतिमाओं के रूप में व्यक्त किया. बाइजेंटाइन कला की तुलना वर्तमान काल की अमूर्त कला से की जा सकती है. मध्यकाल के दौरान रोमांनेस्क्यू और गोथिक चर्चों को स्थापत्य और भित्ति चित्रों से अलंकृत किया गया. तत्कालीन भित्ति चित्रों में एक विशेष अपील दिखाई पड़ती है. बाइजेंटाइन स्थापत्य व वास्तुकला के प्रभाव से रोमांनेस्क्यू कला में पैनल चित्रकारी एक सामान्य चीज हो गई और उसका बहुत योगदान रहा. 13वीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते मध्यकालीन कला व गोथिक चित्रकारी यथार्थवादी हो गई. यथार्थवादी कला का सबसे ज्यादा प्रभाव इटली पर पड़ा. इस काल के चर्चों में अधिक खिड़कियां बनाई जाने लगीं और अलंकरण के लिए रंगीन स्टेन शीशों का प्रयोग किया जाने लगा. नोत्रे देम द पेरिस का चर्च इस शैली की प्रतिनिधि इमारत है.
नवजागरणकाल और सदाचारवाद :
नवजागरणकाल में आकर कलाओं पर जो धार्मिक नियंत्रण या प्रतिबन्ध था वह ख़त्म हुआ और मध्यकाल में उपेक्षित कला को उत्कृष्ट बनाने के लिए कलाकारों ने प्राचीन यूनानी और रोमन कलाओं की विशेषताओं का आश्रय लिया. इसी क्रम में डोनाटेल्ले, लिप्पी और बोटसेल्ली ने ग्रीक और रोमन स्थापत्यकला, साहित्य और चित्रकारी में लोगों की रुचि जगाई. फ्लोरेंस नवजागरण का केंद्रबिंदु था. इस काल के कलाकारों ने चित्रकारी के लिए तैलीय रंगों का आविष्कार किया. लियोनार्डो द विन्सी, माइकेलएंजिलो, राफेल, जिओवन्नी बेल्लिनी और टिटियन जैसे महान कलाकारों ने चित्रकारी को एक नया आयाम व ऊँचाई प्रदान की. इस काल की चित्रकारी में मानव शरीर को एक अलग अंदाज में चित्रित किया गया. हैंस हॉलबीन द यंगर, अल्ब्रेख्त ड्यूरर, लुकाच क्रेनाच, मैथियास ग्रेुनेवाल्ड औ्रर पीटर ब्रुगेल जैसे फ्लेमिश, डच और जर्मन चित्रकारों ने इतालवी चित्रकारों की अपेक्षा अधिक यथार्थवादी शैली का विकास किया.
उच्चनवजागरणकाल की शैली से एक कलात्मक शैली सदाचारवाद का विकास हुआ. रोमानो, पोंटार्मो और पर्मीजिआनिनो जैसे कालकारों ने नवजागरण काल की खोजों को अरूढ़ शैली में व्यक्त किया.
शास्त्रीयवाद :
नवजागरण काल के बाद, 17वीं शताब्दी की चित्रकारी में शास्त्रीयवाद मुख्य शैली थी जिसका मुख्य प्रभाव कैथोलिक देशों -  इटली व फ्रांस पर विशेष रूप से पड़ा. लॉरेन और पाऊस्सिन जैसे कलाकारों ने उत्तर सदाचारवादियों की शुष्कता के खिलाफ विद्रोह करते हुए उच्च नवजागरण काल के प्रकृतिवाद की ओर अपना रुख किया.
डच स्कूल :
नीदरलैंड में 17वीं शताब्दी के दौरान डच चित्रकारी का जन्म हुआ. वनहिक, हल्सन और रेम्ब्रां जैसे चित्रकारों ने शांत जीवन एवं प्रतिदिन के प्रसंगों का चित्रण किया. सादगी और सामान्य प्रसंगों का चित्रण ही इस शैली कि विशेषता है. 
नव्य-शास्त्रीयवाद :
18वीं शताब्दी में इटली और ग्रीक की प्राचीन सभ्यताओं के उत्खनन के बाद नव्य-शास्त्रीयवाद का उदय हुआ. नव्य-शास्त्रीयवादी चित्रकारों ने मुख्य रूप से रूमानियत और उदात्तता पर ध्यान दिया. डेविड और इन्ग्रेस इस शैली के प्रतिनिधि कलाकार थे.
रोमांसवाद :
कला में रोमांसवाद का उदय 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ और इसका प्रभाव 19वीं शताब्दी के मध्य तक रहा. फ्रांसिस्को डि गोया, जॉन कांस्टेबल और जे. एम. डब्ल्यू. टर्नर जैसे चित्रकारों ने ने रोमांसवाद का प्रतिनिधित्व किया. रोमांटिक चित्रकारों ने लैंडस्केप चित्रकारी को एक शैली का रूप दिया. मुख्य रूप से इस वाद के कलाकारों ने शास्त्रीयवाद और नव्य-शास्त्रीयवाद के सौंदर्यात्मक और नीतिवादी मूल्यों के खिलाफ विद्रोह करते हुए चित्रों में रूमानी भावनाओं की अभिव्यक्ति की.
यथार्थवाद :
यथार्थवाद का जन्म फ्रांस में हुआ और जल्दी ही पूरे यूरोप और अमेरिका में इसका प्रसार हो गया. कॉउरबेट और मिलेट ने रोमांसवाद की आत्मनिष्ठता एवं व्यक्तिवादिता के खिलाफ विद्रोह करते हुए प्रकृतिवादी शैली अपनाते हुए प्राकृतिक दृश्यों और सामान्य जीवन के चित्र उकेरे. चित्रकला में  में प्रकृतिवादी शैली ही यथार्थवादी शैली मानी जाती है. इस शैली का उत्कर्षकाल 1840-1880 ई. तक मानी जाती है.
प्रभाववाद :
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फ़्रांस के कुछ कलाकारों ने चित्रकला में नए ढंग के प्रयोग किया जिसे प्रभाववाद नाम दिया गया. वे चित्रकार पुरनी रूढ़ियों को तोड़ते हुए खुले में जाकर चित्रकारी करने लगे. नई तकनीक के प्रयोगों के साथ चित्रों में मद्धिम प्रकाश के प्रभाव पर ध्यान दिया गया और पारदर्शी रंगों के प्रयोग की उपेक्षा की गई. रेनॉयर और देगास ने अपनी प्रथम प्रभाववादी प्रदर्शनी का 1874 में पेरिस में आयोजन किया. इनके विषयों में लैंडस्केप और शहरी जीवन का चित्रण करना शामिल था. सिउरेट ने प्रभाववादियों के कार्य को आगे बढ़ाते हुए रंग के बिंदुओं वाली बिंदुचित्रकारी का विकास किया.
संकेतवाद :
संकेतवाद शैली का उदय 1880 के दशक में चित्रकारी में प्रकृतिवादी प्रवृत्तियों, भौतिकवादी मूल्यों और औद्योगिक क्रांति के प्रभावों खिलाफ हुआ. मोरियू और रेडॉन जैसे संकेतवादी चित्रकारों ने प्रभाववाद की प्राकृतिक बिम्बसृष्टि को खारिज करते हुए फंतासी और स्वप्नों की दुनिया में शरण ली.
आधुनिक काल :
1888 ई. से आधुनिक काल की शुरुआत मानी जाती है. 1844ई. में वान गाग, तुलोज लात्रोक, बोन्नार रूसो जैसे नए कलाकारों की प्रदर्शनियों से उत्तरप्रभावाद की शुरुआत होने के कारण इसे आधुनिककाल का प्रथम कला आन्दोलन समझा जाता है. लगभग सौ साल से अधिक के सफ़र में पश्चिमी चित्रकला का आधुनिक काल प्रभाववाद के अतिरिक्त जिन कला आन्दोलनों का साक्षी बना वे हैं : अभिव्यंजनावाद, घनवाद, अमूर्त कला, दादवाद, अतियथार्थवाद, एक्सन पेंटिंग, पॉप कला, आकृतिमूलक कला,ऑप और काइनेटिक कला, फोटो यथार्थवाद, ग्रेफिटी कला आदि.
औद्योगिक क्रांति, साम्राज्यवाद, व्यापार आदि कारणों से यूरोप और अमेरिका का संपर्क विश्व के अन्य देशों से हुआ। फलतः, संस्कृति का आदान-प्रदान हुआ. इस कारण से पश्चिमी चित्रकला पर अफ्रीकी कला, इस्लामिक कला, भारतीय कला, चीनी कला और जापानी कला का बहुत प्रभाव पड़ा है और इन देशों की कलाएँ भी उससे प्रभावित हुई हैं.

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

क्युबिज्म या घनवाद



अंग्रेजी के क्यूबिज्म (cubism) शब्द का हिंदी पर्याय घनवाद है. एक आन्दोलन के रूप में घनवाद का जन्म दरअसल प्रभाववाद की प्रतिक्रिया स्वरुप हुआ था. प्राख्यात कलाकार सेजां ने 15 अप्रैल 1904 को एक युवा चित्रकार को चिठ्ठी में लिखा कि प्रकृति को बेलनाकार, गोलाकार और शंकु रूप में देखना-समझना चाहिए. बाद में सेजां की प्रकृति में ज्यामितीय रूपाकारों की खोज की सोच ने पिकासो और बराक जैसे कलाकारों के माध्यम से इस कला आन्दोलन को जन्म देने में निर्णायक भूमिका निभाई.
घनवाद का मुख्य सरोकर रूपाकार की प्रस्तुति थी – किसी चीज को जैसे हम देखते हैं वैसे उसे सामने नहीं रखा गया, उसकी बनावट और स्पेस में उसका स्थान अधिक महत्वपूर्ण हो गया. यानि एक ही कैनवास या कागज पर एक ही चीज के कई रूपों को प्रस्तुत किया गया. जाहिर है कि परिप्रेक्ष्य के सिद्धांतों को अस्वीकृत किया गया. रंगों की तुलना में रूपाकारों पर अधिक बल दिया गया.
कला समीक्षक लुई वाँसेल ने 1908 में बराक की एक पेंटिंग की चर्चा करते समय ‘घन’(cube) शब्द का इस्तेमाल किया जिसने घनवाद (cubism) नाम की नींव डाली. अंग्रेजी कला इतिहासकार डगलस कूपर ने अपनी मौलिक पुस्तक द क्यूबिस्ट ईपक में क्युबिज़्म के तीन चरणों का वर्णन किया है। कूपर के अनुसार "प्रारंभिक क्युबिज़्म" 1906 से 1908 तक था जब शुरूआत में पिकासो और बराक के स्टूडियो में आंदोलन विकसित किया गया था. दूसरे चरण को "उच्च क्युबिज़्म" कहा जाता है और 1909 से 1914 तक माना जाता है, जिस दौरान जुआन ग्रिस महत्वपूर्ण प्रतिपादक के रूप में उभरे. आखिर में कूपर ने "अंतिम क्युबिज़्म", 1914 से 1921 तक, को कट्टरपंथी नव-विचारक कला आंदोलन यानि क्युबिज्म का आखिरी चरण कहा है.
पाब्लो पिकासो और बराक घनवाद के दो सबसे बड़े कलाकार थे. दोनों ने कुछ समय तक घनवादी चित्र बनाये.1907 में पिकासो ने अपना एतिहासिक चित्र बनाया- ‘आविन्यों की स्त्रियाँ. इस चित्र ने घनवाद को कला आन्दोलन का रास्ता दिखाया. इस पेंटिंग में आदिम कला (खास तौर पर अफ्रीकी कला) से कई चीजें सीखी गई थीं. विषय को सरल ज्यामितीय आकारों में बदल दिया गया था. बाद में अनेक घनवादी कलाकारों ने नीग्रो कला से नई प्रेरणा प्राप्त करने की कोशिश की. घनवाद की बुनियादी सोच यही थी कि कलाकारों को तीन आयामों में जो दिखे उसे एक सपाट सतह पर पूरी तरह से कैसे दिखाया जाए.
अक्सर घनवाद और अमूर्त कला में घालमेल कर दिया जाता है. यह समझा जाता है घनवादी चित्रकार अमूर्तन में दिलचस्पी लेता है और विषय की उपेक्षा करता है. लेकिन स्तिथि इसके विपरीत है. घनवादी चित्रकार तो चीजों को पेंट करना चाहते थे. पर एक कोण से नहीं.
घनवाद के प्रारम्भिक चरण, 1907 से 1912 में चीजों के रूपाकारों के विश्लेषण पर जोर दिया गया था. उसे विश्लेषणात्मक घनवाद कहा जाता है. 1912 के आस पास पिकासो, बराक और जुआन ग्रीस ने कोलाज का इस्तेमाल शुरू किया. अख़बारों से लेकर रेल के टिकटों के टुकड़े कोलाज का हिस्सा बने. इसे विश्लेषणात्मक घनवाद का नाम दिया गया. यह प्रवृति 1915 तक प्रबल रही. विश्लेष्णात्मक घनवाद को भी दो हिस्सों में देखा जा सकता है. 1907-09 में सेजां का प्रभाव प्रबल था और 1909-12 में विश्लेषणात्मक खोजों पर जोर दिया गया.
घनवाद के प्रारंभिक दौर में गिटार, शराब का गिलास, बोतल, अख़बार, मेज जैसी चीजों को न जाने कितने कोणों से देखा गया और एकवर्णी चित्रण को प्राथमिकता मिली. एक एकवर्णी योजना में अक्सर नीले, भूरे और गेरू रंग शामिल होते थे. बाद में कलाकारों को महसूस हुआ कि रूपाकार को सपाट करते चले जाने से चीजें यथार्थ से दूर होती चली जा रही है. घनवाद बुनियादी रूप से एक यथार्थवादी कला आन्दोलन था इसलिए चित्र जब यथार्थ से बहुत दूर होने लगे, तो उन्हें यथार्थ के नजदीक लाने की कोशिश शुरू हुई. इसलिए धीरे धीरे वास्तविक सामग्री और  वर्ण विविधता का उपयोग किया जाने लगा.
घनवादी कलाकारों का रास्ता बाद में भले ही अलग हो गया पर इस कला आन्दोलन ने उन्हें पेंटिंग की एक ऐसी समझ दी जो दूसरे चित्रों के जन्म के लिए जरुरी थी. पिकासो ने बाद में न जाने कितने चित्रों में इस समझ का सार्थक इस्तेमाल किया.
शुरू में घनवादी चित्रों को लोग पसंद नहीं करते थे. कला समीक्षक मजाक उड़ाते थे. घनवाद के प्रारंभिक चरण में किसी ने पिकासो से पूछा कि अगर आप बारसेलोना (स्पेन) स्टेशन पर उतरें और आप के माता-पिता आपको घनवादी पेंटिंग सरीखे चेहरों के साथ घिरा देखें, तो वे क्या सोचेंगे ? इस पर एक कला समीक्षक ने कहा पिकासो से यह सवाल किया जाना चाहिए कि वे अपनी पेंटिंग की किसी स्त्री का साथ चाहेंगे या वीनस का ? ऐसे तमाम व्यंग-विरोधों के वावजूद  बहुत जल्दी ही पश्चिम का वातावरण घनवादी हो गया. ऐसा व्यापक असर पड़ा कि आधुनिक डिजाईन, स्थापत्य और नगर योजनाएँ – सभी कुछ घनवादी क्रांति से प्रेरित होने लगा.
घनवाद ने 6-7 सालों में ही पेंटिंग की धारणा में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया. रेनेसाँ के बाद से पेंटिंग की जो धारणा बन गई थी वह घनवादियों द्वारा तोड़ दी गई. प्रकृति के दर्पण के रूप में कला की धारणा पुरानी पड़ गई. कलाकार का बड़ा और जीनियस होने की मान्यता उसकी घनवादी छवि तय करने लगी. बराक और पिकासो भी अपने घनवादी दौर को कभी पार नहीं कर पाए. उनकी उत्कृष्टता भी घनवाद से सम्बंधित रही और उनका बाद का बहुत-सा काम घनवादी दौर की तुलना में घटिया माना गया.     
फ्रांसीसी कवि वालेरी की शिकायत थी कि घनवाद के पहले दशक में एक पेंटर का काम दूसरे पेंटर से अलग करना मुश्किल था. इस पर समीक्षक वोल्फगांग पालेन ने कहा है, “इससे यह साबित होता है कि घनवाद ने एक सामूहिक रास्ता अपना लिया था. एक महान अज्ञात व्यक्तित्व बन गया था. पेंटिंग, संगीत की बहन ज्यामिति की दुनिया में चली गई थी”.
घनवाद में चित्रकला का सबंध सिर्फ ज्यामिति से ही नहीं बल्कि कविता से भी रहा. घनवाद की मौलिकता का गहरा संबंध उस दौर की अवाँ गार्द कविता से था. पिकासो ने खुद स्वीकार किया है - “वह एक ऐसा वक्ता था जब कवियों और चित्रकारों ने एक-दूसरे को प्रभावित किया”. तत्कालीन प्रतिभाशाली फ़्रांसिसी कवि एपोलीनियर ने घनवादियों की पहली प्रदर्शनी के कैटलॉग में प्रभाववाद पर हमला करते हुए लिखा – “अब एक ऐसी काल के लिए जगह है जो अधिक परिष्कृत, अधिक संयोजित, अधिक प्रभावशाली है”. दरअसल एपोलिनिएर की प्रतिभा, उनकी बौद्धिक क्षमताओं, रचनात्मक उर्जा ने घनवाद का ऐतिहासिक साथ दिया. कवि पियारे रेवेर्दी ने कहा कि दर्शन के क्षेत्र में देकार्ते ने जो किया वही पिकासो ने अनजाने में पेन्टिंग में किया.
पिकासो, बराक और ग्रीस के बाद घनवाद को नए अर्थ और सन्दर्भ देनेवाले चार कलाकार थे - देलोने, लेझे, पिकाविया और मार्सेल दुसाँ. इन चारों ने घनवाद को नए अर्थ और सन्दर्भ दिए. इन कलाकारों ने घनवाद से अपना कार्य शुरू करके, घनवाद और भविष्यवाद[1] के रास्ते और भाषा में काफी भिन्नता के वावजूद, अपनी कला में भविष्यवाद के लक्षणों को प्रश्रय दिया. लेझे ने भविष्यवादियों की तरह अपनी कला में मशीनी पुर्जों का स्वागत किया. इसलिए उनकी कृतियों के सन्दर्भ में ‘ट्यूबवाद’ और ‘सिलिंडरवाद’ जैसे नामों का उपयोग किया जाने लगा. 1917 में बनाई गई उनकी पेंटिंग ‘ताश का खेल’ घनवादी भाषा से प्रारम्भ होकर उससे परे चली जाती है. इस तरह चित्रकला घनवाद से दूसरी ओर मुड़ने लगी.
वर्तमान समय में घनवाद या क्यूबिज्म एक कला आंदोलन से बहुत दूर कला के इतिहास के पूर्व वृतान्तों तक सीमित रहकर भी अनेक समकालीन कलाकारों को अपनी परंपरा और काम की बारीकियों की जानकारी देकर प्रेरित करती है. इसलिए घनवादी चित्रकारी का केवल नियमित वाणिज्यिक उपयोग ही नहीं होता है बल्कि समकालीन कलाकारों की उल्लेखनीय संख्या, आज भी शैलीगत ढंग से और सैद्धांतिक रूप से भी चित्र बनाती है. एक प्रतिनिधी सम्प्रदाय के रूप में घनवाद, चित्रकला में फोटोग्राफी के लगातार बढ़ते महत्व और उसकी जकड़ में आने वाले कलाकारों को प्रेरित करके चित्रकला को फोटोग्राफी से आगे ले जाने में पूरी तरह से मदद करता है. पर कुछ प्रश्न जो 20 वीं सदी के आरम्भ में घनवाद के प्रतिनिधी कलाकारों के समक्ष उठे थे वे आज भी अनुत्तरित ही हैं. उन प्रश्नों में सौंदर्य संबंधी प्रश्न भी हैं.


[1] इतालवी लेखक मरिनेती ने 1909 में काव्यात्मक, कलात्मक और राजनितिक आन्दोलन – ‘भविष्यवाद’ नाम से शुरू किया था. भविष्यवाद ने आदमी और मशीन के सम्बन्ध को जांचने कि भी कोशिश की.