शनिवार, 16 मई 2015

दृश्य विन्यास की प्रक्रिया एवं आवश्यकताएँ



बिना ताम-झाम के भी नाटक हो सकता है, यह बात जितनी सत्य है उतनी ही यह बात भी सत्य है कि दृश्य विन्यास के कारण नाट्य प्रस्तुति बहुत ही प्रभावशाली हो जाती है। नाट्य प्रस्तुति के दौरान दृश्य विन्यास के द्वारा होने वाले कार्य हैं :
·      नाट्य क्रिया का वातावरण का निर्माण
·      नाट्य क्रिया का स्थल निर्धारण
·      नाट्य क्रिया में अभिवृद्धि करना 
·      नाट्य क्रिया का सौन्दर्य बढ़ाना
उपरोक्त तीनों कार्यों के लिए यह आवश्यक है कि दृश्य विन्यास नाट्यानुकूल, अभिव्यक्तिपूर्ण, आकर्षक, स्पष्ट, सरल, उपयोगी और व्यावहारिक हो। दृश्य विन्यास की इन सब विशेषताओं को प्राप्त करने के लिए कोई निश्चित और निर्धारित नियम नहीं है जो दृश्य विन्यासकर्ता के लिए आवश्यक माना जाए। किसी भी दृश्य विन्यासकर्ता की कार्य कुशलता, उसका अनुभव और उसकी रचनात्मकता पर निर्भर करता है। इसलिए वह अपने कार्य करने का तरीका स्वयं निर्धारित करता है। फिर भी दृश्य विन्यास की प्रक्रिया के दौरान संभावित या अवांछित समस्याओं का हल सुगमता से प्राप्त करने के लिए कुछ बातों पर ध्यान देना बहुत ही लाभदायक होता है। दृश्य विन्यास की प्रक्रिया के दौरान जिन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए उनका बिंदुवार वर्णन निम्नलिखित है।
1॰ नाट्यालेख का विश्लेषण
दृश्य विन्यासकर्ता किसी भी नाट्यालेख का सरसरी तौर पर अध्ययन करके उसकी प्रस्तुति के लिए आदर्श दृश्य विन्यास कर सकने में सक्षम होगा यह संभव नहीं है। आदर्श विन्यास के लिए विन्यासकर्ता को चाहिए की निर्देशक से विचार-विमर्श के पूर्व नाट्यालेख का अध्ययन भलीभाँति समझते हुए करे। इससे वह प्रस्तुति के संदर्भ में निर्देशक की जरूरत को आसानी से समझ सकेगा। विन्यास लिए विन्यासकर्ता को कई बार नाट्यालेख का अध्ययन करना पड़ सकता है। नाट्यालेख का पहला अध्ययन एक ही बैठक में करना चाहिए। इससे विन्यासकर्ता नाटक का केंद्रीय भाव, देशकाल, स्थान क्या है और किस प्रकार के पात्र नाट्य क्रिया को सम्पन्न करेंगे, इसे समझने में सक्षम होगा। पहला अध्ययन दृश्य विन्यास की कल्पना का आधार प्रदान करता है। नाट्यालेख का दूसरा अध्ययन नाटक के विभिन्न पक्ष : भौतिक, शिल्पगत, व्याख्यात्मक और व्यवहारिक, पर विचार करते हुए करना चाहिए। एक अच्छा निर्देशक भी इन पक्षों पर विचार करते हुए नाट्यालेख का अध्ययन करता है। अगर विन्यासकर्ता नाटक के विभिन्न पक्षों पर विचार करते हुए अध्ययन नहीं करेगा तो वह निर्देशक के मंतव्य को पूरी तरह से समझ नहीं सकेगा। अगर विन्यासकर्ता को निर्देशक से पूरी स्वतंत्रता मिल भी जाए फिर भी आदर्श दृश्य विन्यास के लिए नाट्यालेख के इन पक्षों का विश्लेषण करना अकनिवार्य समझा जाता है।
कई बार नए विन्यासकर्ता या अतिआत्मविश्वासी विन्यासकर्ता नाट्यालेख प्राप्त होते ही विन्यास के प्रति स्वयं की अवधारणा विकसित करने के बजाय उस आलेख की पूर्व मंच प्रस्तुतियों में हुए मंच सज्जा के आधार पर विन्यास की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं। यह दृष्टिकोण बहुत ही घातक होता है। इससे विन्यासकर्ता की मौलिक प्रतिभा बाधित होकर मृतप्राय होने लगती है। विन्यास की स्वतंत्र अवधारणा का विकास की आदत उसकी प्रतिभा में निखार लाकर उसे कुशल विन्यासकर्ता बनने की ओर अग्रसर करती है। विन्यास की स्वतंत्र अवधारणा के लिए नाट्यालेख का गहन अध्ययन और विश्लेषण आवश्यक है। यह विन्यासकर्ता को व्यक्तिगत लाभ भी पंहुचता है।
मंच की स्थिति के कारण कई बार विन्यासकर्ता के लिए नाटककार द्वारा विन्यास के लिए दिये गए संकेतों का अक्षरशः पालन करना संभव नहीं होता है। इसलिए विन्यासकर्ता को अपने हिसाब से विन्यास करना पड़ता है या फिर नाटककार द्वारा सुझाए गए विन्यास में बदलाव लाना पड़ता है। इस स्थिति में नाट्य प्रस्तुति के लिए जरूरी दृश्य विन्यास तभी संभव होता है जब विन्यासकर्ता नाट्यालेख का भलीभाँति अध्ययन किया हो।
उपरोक्त तथ्य को देखते हुए हम यह कह सकते हैं की आदर्श विन्यास के लिए विन्यासकर्ता द्वारा नाट्यालेख का अध्ययन-विश्लेषण आवश्यक रूप से किया जाना चाहिए।           
2॰ प्रस्तुति सदस्यों के साथ विचार-विमर्श
किसी भी नई नाट्य प्रस्तुति की तैयारी के लिए यह आवश्यक होता है कि प्रस्तुति से जुड़े सदस्यों के बीच कम-से-कम एक बार विस्तार से विचार-विमर्श हो। विचार-विमर्श के आभाव में यह संभावना बनी रहती है कि दृश्य विन्यासकर्ता का दृष्टिकोण निर्देशक या अन्य पक्षों के प्रभारी से नहीं मिले। ऐसी स्थिति में प्रस्तुति की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रस्तुति की सफलता के लिए इससे जुड़े सदस्यों के साथ विचार-विमर्श आवश्यक होता है। विचार-विमर्श के दौरान ही दृश्य विन्यासकर्ता को विन्यास के लिए आवश्यक जानकारी, जैसे- विन्यास की शैली, प्रदर्शन का समय, दृश्य सज्जा के लिए निर्धारित बजट, प्रेक्षागृह और मंच क्षेत्र, उपलब्ध उपकरण आदि पर चर्चा कर लेनी चाहिए जिससे व्यवहारिक कार्य शुरू करने में अनावश्यक देरी न हो और कार्य के बीच में कोई परेशानी आए तो तुरंत उसका निराकरण हो सके। दृश्य विन्यास के प्रति अपनी सोच और मनोभावों को विन्यासकर्ता विकल्प के तौर पर विचार-विमर्श के दौरान ही निर्देशक को बताता है जो उसके लिए कार्य स्वतंत्रता प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।   
3॰ नाट्य प्रस्तुति की तकनीकी आवश्यकताएँ
जब प्रस्तुति के लिए कम दृश्य सज्जा की जरूरत हो तो ज्यादा परेशानी नहीं होती है लेकिन अगर जब बहुत दृश्य सज्जा और उसके परिवर्तन की जरूरत होती है तो परेशानी शुरू हो जाती है। इन परेशानियों से बचने के लिए कई प्रकार के मंचों का निर्माण हुआ है। लेखक भी इस बात का ध्यान रखते हैं कि नाटक ऐसे न लिखे जाएँ जिसकी दृश्य सज्जा जटिल हो और निर्देशक भी ऐसी प्रस्तुति से बचते हैं। लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। न हर जगह सुविधाजनक मंच मिल सकता है और न सिर्फ दृश्य विन्यास की जटिलता के लिए अच्छे विषय पर आधारित नाटक की उपेक्षा उचित है। पर यह भी सत्य है कि अधिक दृश्य सजा के कारण दृश्य परिवर्तन में अनावश्यक विलंब या व्यावधान होता है तथा नाट्य क्रिया कि गति और निरंतरता भंग होती है। इस स्थिति में विन्यासकर्ता अतिरिक्त तकनीक का प्रयोग करके प्रस्तुति को सफल बनाता है। इसके लिए विन्यासकर्ता को सभी प्रकार के तकनीक की जानकारी होनी चाहिए जिसका वह अपने अनुभव और बुद्धि से रचनात्मक उपयोग कर सके।    
4॰ मंच क्षेत्र एवं उपलब्ध सुविधाएं
यह संभव नहीं है कि विन्यासकर्ता को हर जगह आदर्श मंच क्षेत्र और सारी सुविधाएं उपलब्ध हो क्योंकि हमारे देश के बड़े शहरों में ही कुछ ही प्रेक्षागृह आदर्श और सुविधा सम्पन्न हैं, पर नाटक छोटे शहरों में, स्कूल, कॉलेज एवं अस्थाई मंचों पर भी होता है और दृश्य विन्यासकर्ता को विन्यास करना होता है। ऐसी स्थिति में विन्यासकर्ता को विन्यास से पहले जिन बातों का अवलोकन करना पड़ता है वह हैं, मंच क्षेत्र और दर्शक दीर्घा के बीच दृष्टि रेखा, मंच की आकृति, लम्बवत और क्षैतिज पर्दों के उपयोग की संभावना, मुख्य पर्दे का उठने और गिरने का ढंग, प्रकाश सेतु की दूरी और उसकी क्षमता, नेपत्थ और उसमें लगे उपकरण, दृश्य इकाइयों को फ्लाई में ले जाने की व्यवस्था और उसके लिए आवश्यक बेटन की स्थिति, सायक्लोरामा की स्थिति, मंच क्षेत्र पर कील और पेंच लगाए जाने की सुविधा, प्रकाश संचालन का स्थान और अगर मंच गतिशील है तो उसके संचालन का स्थान, स्थिति और तरीका। 
उपरोक्त स्थितियों का अवलोकन कर लेने के बाद किसी भी मंच पर प्रदत्त परिस्थितियों के अनुसार विन्यासकर्ता सुगमता से विन्यास कर सकता है।
5॰ दृश्य विन्यास कार्यशाला एवं उपलब्ध उपकरण
दृश्य विन्यासकर्ता को विन्यास की आधार योजना  बनाने के पहले कार्यशाला की स्थिति, उसकी क्षमता, मंच के सापेक्ष उसकी दूरी, सीमाएं और कार्यशाला में उपलब्ध उपकरण का आकलन कर लेना चाहिये क्योंकि ये सब भी कार्य की जटिलता या सुगमता के निर्धारक होते हैं।
6॰ दृष्टि रेखाएँ
दर्शक दीर्घा से मंच तक आनेवाली सभी दृष्टि रेखाओं से और प्रकाश की विभिन्न तीव्रता के सापेक्ष दृश्य विन्यास स्पष्ट दिखाई पड़े इसके लिए विन्यासकर्ता को चाहिए की वह मंच के क्षैतिज प्रभाग और लम्बवत प्रभाग को ध्यान में रखकर विन्यास का आकार-प्रकार निर्धारित करे।
7॰ शोध कार्य
भिन्न-भिन्न नाटकों के देशकाल और परिवेश अलग-अलग होते हैं। विन्यासकर्ता को नाटक में वर्णित देशकाल और परिवेश के अनुसार ही दृश्य सज्जा करनी होती है अन्यथा प्रस्तुति को हास्यास्पद होते देर नहीं लगती है। विन्यासकर्ता को नाटक के देशकाल और परिवेश के स्थापत्य, रहन-सहन और साज-सज्जा की गहरी जानकारी होनी चाहिए। सतही जानकारी से विश्वसनीय और प्रभावशाली दृश्य सज्जा नहीं की जा सकती है। अतः विन्यासकर्ता को नाटक के देशकाल और परिवेश पर शोध करना चाहिए तभी वह आदर्श, विश्वसनीय और प्रभावशाली दृश्य विन्यास कर पाएगा। शोध के पश्चात किया गया दृश्य विन्यास, विन्यासकर्ता को निश्चय ही ख्याति प्रदान करता है।  
8॰ रेखाचित्र एवं लघु आकारीय मॉडल
प्रस्तुति में सम्मलित सभी लोगों को दृश्य सज्जा का स्पष्ट रूपाकार सूचित होना चाहिए ताकि वह कुछ सुझाव देना चाहें तो दे सकें। इसके लिए विन्यासकर्ता कल्पित विन्यास का रेखाचित्र या 3डी मॉडल तैयार करता है। यह कार्य विन्यासकर्ता के लिए भी उपयोगी होता है क्योंकि विन्यास योजना की जो खामियाँ उसके मन की आँखों से छिपी होती है वह इससे आसानी से पता चल जाती है जिसे वह समय रहते दूर कर लेता है। दृश्य विन्यास का रेखाचित्र से ज्यादा प्रभावी उसका 3डी मॉडल होता है जिसे गत्तों, थर्मोकोल, खपच्चियों आदि को गोंद से चिपका कर तैयार किया जाता है।   
9॰ विन्यास की योजना
कल्पित दृश्य सज्जा का रेखाचित्र या मॉडल से विन्यास की आकृति-प्रकृति का पता तो चलता है लेकिन मंच पर उसका वास्तविक आकार क्या होगा इसके लिए विन्यास की विस्तृत योजना तैयार करना आवश्यक होता है क्योंकि मॉडल के आकार से विन्यास के वास्तविक आकार का पता लगाना तकनीशियनों के लिए कठिन होता है। इसलिए विन्यासकर्ता दृश्य सज्जा के प्रत्येक भाग का उचित नाप के साथ अलग-अलग चित्र बनाता है। ताकि तकनीशियन आसानी से अपना काम कर सकें। दृश्य सज्जा के मोटे भागों के अतिरिक्त सूक्ष्म सज्जा, जो रेखाचित्र में दिखाई भी नहीं पड़ते हैं, विन्यासकर्ता को उनका वास्तविक चित्र बनाना पड़ता है। विन्यास योजना के बिना वैसा ही विन्यास, जैसा विन्यासकर्ता चाहता है, तैयार करना संभव नहीं हो सकता है।
10॰ सामाग्री का चयन
दृश्य सज्जा का अलंकरण और उचित परिवेश दिखाने के लिए विभिन्न सामाग्री यथा पर्दे ,चादर, फर्नीचर आदि का चयन करना पड़ता है। इसे हम मंच सामग्री भी कहते हैं। यह सामग्री नाटक के देशकाल के अनुरूप और विन्यास में प्रयुक्त रंगो के अनुकूल होना चाहिए। उचित अलंकरण और सामाग्री के अभाव में कुशलतापूर्वक किया गया दृश्य विन्यास भी प्रभावित होता है। मंच सामाग्री के चयन या निर्माण में निर्देशक की राय लेना आवश्यक होता है क्योंकि ये सामाग्री नाट्य क्रिया में प्रत्यक्षतः सहायक होती हैं।
11॰ दृश्य रंगन
दृश्य विन्यास में रंगों का बहुत ज्यादा महत्व होता है। इसलिए विन्यासकर्ता को दृश्य सज्जा का रंगन अपने देख-रेख में करवाना चाहिए क्योंकि यह आवश्यक नहीं है कि रंग करनेवाला तकनीशियन अनुभवी हो। रंगन में हुई थोड़ी भी गलती साज- सज्जा को प्रभावहीन कर सकता है। इसलिए इसमें अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत होती है।
12॰ तैयार दृश्य सज्जा का अलंकरण और अंतिम रूप प्रदान करना।
मंच पर पूरी दृश्य सज्जा लगाने के बाद विन्यासकर्ता का अंतिम कार्य उसके अलंकरण और आवश्यक कमियों को दूर करना होता है। अगर प्रारम्भिक कार्य सही से हुआ हो तो यह अंतिम कार्य मात्र औपचारिक होता है। फिर भी सामग्रियों की सही स्थिति, पर्दा खुलने से कोई व्यावधान आदि को देख-भाल लेना आवश्यक होता है।
यह आवश्यक नहीं है कि दृश्य विन्यासकर्ता उपरोक्त सभी बातों का पालन करे ही। वह अपने अनुभव और प्रशिक्षण के अनुसार कुछ बातों को छोड़ सकता है या उनका क्रम बदल सकता है। लेकिन एक नए विन्यासकर्ता को चाहिए कि वह उपरोक्त सभी बातों का इसी क्रम में पालन करे। इससे वह सुंदर और सटीक दृश्य विन्यास सरलता से कर पाने में सक्षम होगा।

  

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

नाट्य प्रस्तुति में आनेवाली प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समस्याएं



नाट्य प्रस्तुति एक जटिल सामूहिक कार्य है. इसके स्वरुप का सामूहिक और जटिल होना ही प्रस्तुति प्रक्रिया के तीनों भागों (preproduction, production & postproduction) में विभिन्न स्तरों पर समस्याएँ उत्पन्न करती है. ऐसी समस्याओं में से कुछ समस्याएँ हमारी आँखों के सामने स्पष्ट होती हैं तो कुछ परोक्ष भी होती हैं. इन्हें ही क्रमशः प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समस्याएँ कहा जाता है. नाट्य प्रस्तुति के दौरान आनेवाली प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समस्याएँ निम्नलिखित हैं.
प्रत्यक्ष समस्याएँ :

  • वित्त की व्यवस्था : संसार का कोई भी महत्वपूर्ण कार्य वित्त के आभाव में नहीं हो सकता है. नाट्य प्रस्तुति भी इसका अपवाद नहीं है. इसके लिए भी सबसे पहले धन की ही जरूरत होती है. धन की व्यवस्था कोई आसन काम नहीं हैं. व्यावसायिक नाट्य संस्थाएं टिकट बेचकर धन कमाती है. लेकिन शौकिया नाट्य संस्थाओं के लिए धन की व्यवस्था सर्वप्रमुख समस्या होती है. उन्हें सरकारी ग्रांट के भरोसे ही रहना पड़ता है. किसी भी नाट्य संस्था को जल्दी-जल्दी सरकारी ग्रांट तो मिल नहीं सकता है. इसलिए वे लम्बे समय अंतराल के बाद ही प्रदर्शन कर पाती है. सरकार से मिला ग्रांट इतना पर्याप्त नहीं होता है कि उससे कोई बहुत बड़ी और भव्य  प्रस्तुति करने के बाद कलाकारों को भी उचित पारश्रमिक दिया जा सके. इस कारण से शौकिया नाट्य संस्थाएं ना तो बेहद अच्छी प्रस्तुति दे पाती है और न ही कलाकारों को उचित पारश्रमिक दे पाती है. आज व्यवसायिक नाट्य संस्थाओं की भी स्थिति अच्छी नहीं है. देश भर की कुछ चुनिंदा संस्थाओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश संस्थाएं अर्थाभाव से जूझ  रही है. इन सब कारणों से कलाकार नाटक का रूख न करके फिल्मों की ओर जाते हैं. या फिर नाटक को फिल्मों की तरफ जानेवाली सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते है. यह सारी स्थिति नाटक के भविष्य के लिए शुभ नहीं है और इसका कारण अर्थाभाव ही है
  • प्रशिक्षित कलाकारों का आभाव : नाट्य प्रस्तुति के लिए प्रशिक्षित कलाकारों का आभाव बहुत बड़ी समस्या है. रोजगार की अनिश्चितता के कारण लोग इस क्षेत्र में प्रशिक्षण के लिए कम ही आते हैं. आज भी अधिकांश लोग शौकिया ही नाटक करते हैं और इसके लिए प्रशिक्षण आवश्यक नहीं समझते है. वैसे लोग ही विधिवत प्रशिक्षण लेना चाहते हैं जिन्हें इस क्षेत्र में कैरियर बनाना होता है. उनमें से अधिकांश सिनेमा की तरफ ही बढ़ाना चाहते हैं. देश में कुछ प्रशिक्षण संस्थान तो खुले हैं लेकिन उपरोक्त कारणों से उनमें से निकले प्रशिक्षित कलाकारों की संख्यां इतनी अधिक नहीं है कि उनकी उपलब्धता सर्वत्र हो. हम स्पष्टतः यह देखते हैं कि प्रशिक्षित कलाकारों के आभाव में बहुत कम ही उम्दा प्रस्तुति हो पाती है. अतः प्रशिक्षित कलाकारों का आभाव नाट्य प्रस्तुति के लिए प्रत्यक्ष समस्या है.
  • पूर्वाभ्यास के लिए स्थान : आज भी पूरे देश में अधिकांश जगहों पर, अधिकांश संस्थाओं के पास अपना प्रेक्षागृह नहीं है. उनका दफ्तर भी किराये के मकानों में ही चलता है. अर्थाभाव के कारण वे किराये पर कितना जगह ले पाते हैं इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है. पूरे देश में फैली इप्टा जैसी संस्था का भी यही हाल है. ऐसी स्थिति में नाटक के लिए पूर्वाभ्यास की समस्या बहुत गंभीर हो जाती है. संस्थाएं कई तरह के उपाय करके छोटी जगहों पर या सार्वजानिक जगहों पर पूर्वाभ्यास कराती हैं. प्रदर्शन के दिन वे प्रेक्षागृह का इस्तेमाल कर पाती है क्योंकि इसके लिए उसे बड़ी राशि भुगतान करना पड़ता है. छोटी जगहों पर पूर्वाभ्यास करने और प्रस्तुति बड़े मंच पर होने से समूहन आदि की गलतियाँ सामान्य बात हो जाती है. इस प्रकार प्रस्तुति की गुणवत्ता प्रभावित होती है.  

  • नेपथ्य के कलाकारों की कुशलता : नाट्य प्रस्तुति के दौरान जो कलाकार मंच पर होते हैं उससे थोडा भी कम महत्वपूर्ण नहीं होते हैं नेपथ्य के कलाकार. नाटक के केंद्रीय व्यक्ति निर्देशक से लेकर सेट, लाइट और म्यूजिक डिज़ाइनर के अतिरिक्त सम्बंधित संचालक तक नेपथ्य के कलाकार हैं. ये सभी मिलकर प्रस्तुति को सफल बनाते है. सामान्यतः लोगों की यह प्रवृति होती है कि वे मंच पर ही दिखना चाहते हैं. कम ही लोग नेपथ्य के कार्य सीखना चाहते हैं. इसलिए हमेशा से अभिनेताओं की अपेक्षा नेपथ्य के कलाकारों की संख्यां कम ही रही है. पहले तो नेपथ्य के कलाकारों की कम संख्यां, और फिर उनमें कार्य-कुशलता का आभाव, बेहद गंभीर समस्या उत्त्पन्न कर देती है.    
  • जनसंपर्क और प्रचार-प्रसार : प्रदर्शनकारी कलाओं की प्रस्तुति स्वान्तः सुखाय नहीं बल्कि दर्शकों के लिए होती है. लम्बे समय के परिश्रम के बावजूद प्रस्तुति को देखने पर्याप्त दर्शक नहीं आ पायें तो इस स्थिति में प्रस्तुति की सफलाता संदिग्ध हो जाती है क्योंकि कलाकार हतोत्साहित हो जाते हैं. प्रस्तुति देखने पर्याप्त दर्शक आएं इसके लिए यह आवश्यक होता है कि ज्यादा-से-ज्यादा लोगों तक प्रस्तुति की जानकारी पहुंचाई जाए और उसकी विशेषताओं का उल्लेख किया जाए. इसके लिए जनसंपर्क और मीडिया के सहारे की जरूरत होती है. प्रस्तुति के बाद उसकी सम्यक समीक्षा उसके पुनरावृति की बारंबारता निर्धारित करती है. सभी संस्थाएं मजबूत जनसंपर्क कायम नहीं कर पाती हैं. अर्थाभाव के कारण बढ़िया प्रचार-प्रसार भी नहीं कर पाती है. आधुनिक मीडिया नाटकों के तरफ ज्यादा ध्यान नहीं देती है. छोटे जगहों पर आज भी नाटकों को मीडिया कवरेज नहीं मिल पता है. इसलिए कई महत्वपूर्ण प्रदर्शनों की तरफ लोगों का ध्यान जाता ही नहीं है. अतः जनसंपर्क और समुचित प्रचार-प्रसार का आभाव भी नाट्य प्रदर्शन की सफलता में समस्या उत्तपन्न करती है.
अप्रत्यक्ष समस्याएँ :
  • समय की पाबंदी का आभाव : नाट्य प्रस्तुति, कला की ऐसी विधा है जिसमें अनुशासन की नितांत आवश्यकता होती है. समय की पाबंदी अनुशासन का महत्वपूर्ण घटक होता है. लेकिन ऐसा देखा जाता है कि नाटक के अधिकांश कलाकारों में समय की पाबंदी का आभाव की बुरी आदत होती है. अगर प्रस्तुति समूह में कोई कलाकार समय का पाबंद नहीं होता है तो पूर्वाभ्यास के समय उसके साथी कलाकार मानसिक तौर पर बिक्षुब्ध होते हैं. ऐसी स्थिति अगर लगातार बरक़रार रहे तो प्रस्तुति की गुणवत्ता निश्चय ही प्रभावित होती है. सिर्फ पूर्वाभ्यास ही नहीं हर स्तर पर, प्रस्तुति से जुड़े हर व्यक्ति के समय का पाबंद हुए बिना अच्छी प्रस्तुति कतई संभव नहीं है. इसे अप्रत्यक्ष समस्या इसलिए कहा जाता है क्योंकि किसी समूह के सभी कलाकार एक ही साथ समय का दुरूपयोग करनेवाले नहीं होते हैं. इसलिए प्रस्तुति तो संभव हो जाती है लेकिन उसकी उत्कृष्ठता कम हो संदिग्ध जाती है.
  • आपसी तालमेल : किसी भी नाट्य समूह के कलाकारों या अन्य सदस्यों बीच वैमनस्यता की स्थिति स्वभावतः ही रंगकर्म के शर्तों के विपरीत होती है. तो इस स्थिति में अच्छी प्रस्तुति कैसे संभव हो सकती है? नाटक साधारण कार्य नहीं बल्कि सृजनात्मक कार्य है जिसके लिए स्वस्थ तन के अतिरिक्त प्रसन्न मन की भी आवश्यकता होती है. समूह में तालमेल का आभाव सदस्यों के मन की प्रसन्नता को ख़त्म कर देता है. फिर नाट्यकर्म निपटाने जैसी स्थिति में पहुँच जाता है और इस स्थिति में सफल प्रस्तुति बहुत कम ही हो पाती है.
  • जनभावना और दर्शकों की रुचि : जब हम किसी नाटक की प्रस्तुति का विचार करते हैं तो हमारे सामने सबसे पहला प्रश्न होता है, क्या हमने जो आलेख चुना है वह जनभावना के अनुकूल है? क्या इससे कोई विवाद या दंगा फसाद भी होगा? बेशक विषय पूर्णतः सत्य हो फिर भी. भारत के सामाजिक ढांचे में यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है. व्यवसायिक संस्थाओं को तो हमेशा यह ध्यान रखना होता है कि क्या दर्शक मिल पाएंगे? ज्यादा दर्शक मिलें, इसलिए उन्हें हमेशा मनोरंजकता का ध्यान रखना होता है. इन  कारणों से संस्थाएं सक्षम होकर भी अच्छी और ज्वलंत मुद्दे पर आधारित नाटक नहीं प्रस्तुत कर पाती है. जनभावना के कारण, प्रस्तुति वैसी नहीं होती है जैसी होनी चाहिए. उसमें महत्वपूर्ण प्रश्नों और नग्न सत्य को नहीं दिखाया जाता है. यह स्थिति समाज के लिए अच्छी नहीं मानी जा सकती है. इसमें नाटक सामाजिक परिवर्तन के मूल उद्येश्य से च्युत हो जाता है.     
  •  आपदा प्रबंधन की समस्या : आपदा प्रबंधन के समुचित उपाय किये बिना नाट्य प्रदर्शन में हमेशा छोटी-बड़ी दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. संभावित आपदा के लिए हर ढंग से निश्चिन्त हुए बिना प्रस्तुति करने में पूरी संस्था हमेशा आशंकित और डरी हुई रहती है. आशंका और डर के साए में अच्छी प्रस्तुति संभव नहीं हो पाती है. अतः यह भी एक बड़ी अप्रत्यक्ष समस्या है.
  • उचित सरकारी संरक्षण : पहली बात, रंगकर्म के मूल में विद्रोह होता है और विद्रोह को कभी सत्ता का प्रश्रय नहीं मिलता है. दूसरी बात, रंगकर्म सभ्यता की बहुत बड़ी आवश्यकता है लेकिन किसी एक मनुष्य के लिए मूलभूत आवश्यकता, रोटी, कपड़ा और मकान, जैसी आवश्यकता नहीं है. इसलिए इसे जन सामान्य से ज्यादा सरकारी संरक्षण की आवश्यकता होती है. दोनों स्थितियां विरोधाभासी है. इसलिए रंगकर्म हमेशा संकटों से जूझता रहता है.     
उपरोक्त बातों के अतिरिक्त समुचित सुरक्षा-व्यवस्था का आभाव, कभी-कभी कानूनी प्रावधान और विभिन्न संस्थाओं की आंतरिक प्रतिस्पर्धा आदि भी नाट्य प्रस्तुति के लिए अप्रत्यक्ष समस्याएं होती हैं.
  
    सन्दर्भ : पूरे सत्र के दौरान इस विषय और उपविषयों से सम्बंधित कक्षा व्याख्यान.  

आपदा प्रबंधन की नाट्य व्यवहारिकता



आपदा प्रबंधन की नाट्य व्यावहारिकता पर विचार करने से पहले हम आपदा प्रबंधन के स्वरूप पर चर्चा करते है. आखिर आपदा प्रबंधन है क्या? आपदा प्रबंधन, आपदा और प्रबंधन दो शब्दों के मेल से बना है. आपदा, की परिभाषा विभिन्न व्यक्ति विभिन्न तरह से दे सकते है. जैसे कोई कहता है: आपदा वह मानव जनित अथवा प्राकृतिक घटना है, जिसके परिणामस्वरूप जान-माल की व्यापक क्षति होती है. इसलिए इसका अंत मानवीय वेदना तथा कष्टों में होता है. दूसरी परिभाषा हो सकती है : आपदा एक असामान्य घटना है जो थोड़े ही समय के लिए आती है और विनाश के चिन्ह लंबे समय के लिए छोड़ जाती है.
Oxford dictionary में कहा गया है: an unexpected event, such as a very bad accident, a flood or a fire, that kills a lot of people or causes a lot of damage – अर्थात, कोई अनचाही घटना, जैसे कि कोई बुरी दुर्घटना, बाढ़ या आग जिसमें बहुत लोग मारे गए हों, बहुत अधिक क्षति हुई हो, आपदा कहलाती है. इन सभी परिभाषाओं में एक बात सामान्य है, वह है- unexpected event यानि अनचाही घटना. दूसरी बात oxford dictionary की परिभाषा से निकलकर आती है. वह है very bad accident. नाटकीय संदर्भ में आपदा प्रबंधन को समझने के लिए हमें इन दो बातों पर गौर करना चाहिए. छोटी दुर्घटना भी तो बहुत बुरी हो सकती है. अमूमन लोग आपदा को बड़े मायने में ही समझते हैं. लेकिन यह उचित नहीं है. आपदा को कार्य या तंत्र या व्यवस्था सापेक्षिक समझा जाना चाहिए. अगर छोटे कार्य में, छोटे तंत्र में या छोटी सी व्यवस्था में कोई अनचाही छोटी सी भी बात हो जाए, जिसके कारण वह कार्य, तंत्र या व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो जाए, तो वह घटना उसके लिए आपदा ही है. आपदा के सिवाय और कुछ नहीं. अब हम प्रबंधन पर विचार करते है. प्रबंधन वस्तुत: किसी भी स्थिति या स्थितियों के विरुद्ध की गई व्यवस्था को कहा जाता है. आपदा अनचाही ही सही एक स्थिति ही है. अत: उसके विरुद्ध की गई व्यवस्था, उससे निपटने के लिए, या उसके प्रभाव को यथा संभव कम करने के लिए, आपदा प्रबंधन कहलाता है. अब हम आपदा प्रबंधन को  नाट्य के सन्दर्भ में समझने का प्रयास करते है. इसके लिए हमें नाट्य के स्वरूप और संभावित आपदा पर विचार करना होगा. फिर आपदा प्रबंधन की नाट्य व्यावहारिकता आसानी से स्पष्ट हो जाएगी. नाट्य अपने प्रकारों से निरपेक्ष, कई लोगों के लंबे श्रम की अपेक्षा रखता है. इसमें विभिन्न कलाओं का समावेश होता है. सिनेमा के उलट प्रस्तुति के समय अभिनय के साथ-साथ मंच और पात्र सामग्री के अतिरिक्त सेट और विभिन्न अभिनय क्षेत्रों का समुचित और कुशलता पूर्वक उपयोग दर्शकों के सामने ही करना होता है. इस जटिल कार्य – व्यापार में अनेकों आपात स्थितियाँ हो सकती हैं. गिनती करने पर तो बहुत अधिक आपात स्थितियों को गिना जा सकता है लेकिन विषय को स्पष्ट करने के लिए मैं मुख्य आपात स्थितियों की ही चर्चा कर रहा हूँ.
  •   प्रस्तुति के दिन किसी कलाकार का आक्समिक बीमार पड़ जाना, दुर्घटना हो जाना या उसके परिजन का निधन हो जाना आदि.
  •   किसी कलाकार का अन्य कारणों से समय पर नहीं पहुँच पाना.
  •     भीषण आँधी-तूफान-वर्षा का आ जाना.
  • शॉर्ट-सर्किट से आग लग जाना.
  •   प्रदर्शन के समय किसी लाइट का फ्यूज हो जाना.
  •   अभिनय के दौरान किसी प्रकार की दुर्घटना हो जाना. जैसे-चाकू, लाठी आदि किसी कलाकार को लग जाना
  • अभिनय के दौरान किसी कलाकार द्वारा संवाद भूल जाना, दूसरे के संवाद बोल देना कई संवाद छोड़ देना आदि
  •   मंच-क्षेत्र में या दर्शक दीर्घा में साँप, बिच्छु आदि कीड़े-मकोड़े का निकाल आना.
  •   सेट का धंस जाना, टूट जाना, सेट बनाने में प्रयुक्त कील आदि का किसी कलाकार के पाँव में धंस जाना.
  •   प्रस्तुति के लिए दर्शकों की अनुमानित संख्यां के लिए की गई व्यवस्था से अधिक दर्शकों के आ जाने से या किसी प्रकार की अपवाह फैल जाने से अफरातफरी या भगदड़ मच जाना.
नाट्य प्रस्तुति के लिए ये सभी स्थितियां आपदा हैं. जिनका पूर्वानुमान बेहद कम होता है. कभी-कभी बिलकुल होता ही नहीं है. कुछ स्थितियाँ कम असरकारक तो कुछ अधिक असरकारक होती हैं. कम असरकारक स्थितियाँ प्रस्तुति में बाधा या अवरोध उत्पन्न करती हैं तो ज्यादा असरकारक स्थिति प्रस्तुति को असफल बना सकती है. अभी बताई गई सभी स्थितियों का परिणाम हम सभी लोग सहज ही समझ सकते है. लेकिन प्रस्तुति का वसूल, ‘show must go on’ हमें किसी भी स्थिति में उसे रोकने की इजाजत नहीं देता है. इसलिए हमें अपने विवेक और अनुभव का सहारा लेकर किसी भी संभावित आपात स्थिति से निपटने की व्यवस्था पहले ही कर लेनी चाहिए. नाट्य प्रस्तुति को प्रभावित करनेवाली संभावित किसी भी आपदा से निपटने की व्यवस्था कर लेना ही नाट्य के सन्दर्भ में आपदा प्रबंधन है.        
जब हम किसी प्रस्तुति की तैयारी करते हैं तो हमारा एक मात्र उद्देश्य उसकी सफलता होती है. इसे ही नाट्य शास्त्र में थोड़ा विश्लेषित करके सिद्धि कहा गया है. किसी भी प्रकार की आपदा नाट्य प्रस्तुति में बाधा उत्पन्न करके उसे विफलता की ओर ले जाती है. यानि की सिद्धि में बाधा उत्पन्न करती है. जबकि उचित प्रबंधन हमें समग्र सिद्धि यानि पूर्ण सफलता की निश्चितता की ओर ले जाती है. यही आपदा प्रबंधन की नाट्य व्यावहारिकता है.

 संदर्भ :
1. आपदा प्रबंधन – मानक लक्ष्य सिरीज
2. Oxford Advance Learner’s Dictionary