रविवार, 5 अप्रैल 2015

निर्देशन पद्धति – सिद्धान्त एवं व्यवहार



नाट्य प्रस्तुति एक सामूहिक कार्य है जिसमें लगभग सभी कलाओं का समावेश होता है। हम व्यवहार में देखते हैं, अगर कोई कार्य सामूहिक होता है तो उस समूह में एक नेता की आवश्यकता होती है जो उस सामूहिक कार्य को सुचारु रूप से सम्पन्न करवा सके। समूह के सदस्य अलग-अलग पृष्ठभूमि और मानसिक स्तर के होते हैं इसलिए उनके सोचने, कार्य करने का तरीका और एक दूसरे से समंजस्य स्थापित करने का तरीका अलग-अलग होता है। ऐसी स्थिति में एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो सारी स्थितियों को नियंत्रित करते हुए समूह को लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर करे। नाट्य प्रस्तुति के लिए बिलकुल यही स्थिति की संभावना सौ प्रतिशत से भी अधिक होती है। इसलिए नाट्य प्रस्तुति करनेवाले समूह में भी एक नेता होता है. जिसे हम निर्देशक कहते हैं।
पश्चिम में निर्देशक की परंपरा शुरु से ही रही है। भारत में नाटक को चाक्षुष यज्ञ तो कहा गया है लेकिन उस यज्ञ के ऋत्विक का उल्लेख नहीं मिलता है। हाँ संस्कृत रंगमंच पर सूत्रधार की उपस्थिति और उसकी जिम्मेदारियों को देखकर हम उसका साम्य निर्देशक से समझते हैं। बेशक नाम कुछ भी हो लेकिन भारत में भी लोकमंच से लेकर शास्त्रीयमंच पर एक ऐसा व्यक्ति रहा है जिसका कार्य निर्देशक जैसा होता था। बहरहाल, आधुनिक समय मे भारतीय रंगमंच पर जो निर्देशक की अवधारणा है, पश्चिम से आई है। वर्तमान में निर्देशक प्रस्तुति प्रक्रिया में केंद्रीय व्यक्ति होता है। नाट्य प्रस्तुति की प्रक्रिया में वह विभिन्न चरणों से गुजरता है। इन चरणों का क्रम ही निर्देशन पद्धति के तौर पर जाना जाता है। निर्देशन पद्धति के विभिन्न चरणों का व्यवस्थित और मानक क्रम ही इसके सिधान्त के रूप में मान्य हैं। लेकिन व्यवहार भिन्न-भिन्न निर्देशकों की योग्यता और अनुभव के अनुसार भिन्न-भिन्न तरह से हो सकते हैं।
नाट्य प्रस्तुति की प्रक्रिया को मूलतः तीन भागों में बांटकर विचार किया जाता है। प्रस्तुति-पूर्व (preproduction), प्रस्तुति (production) और प्रस्तुति-पश्चात (postproduction)। इन तीनों भागों में निर्देशक अपने सहयोगियों की मदद से अपना काम करता है जो क्रमानुसार इस प्रकार है।
प्रस्तुति-पूर्व(preproduction) में :
1)     नाट्यालेख का चयन, पठन और विश्लेषण।
2)     नाटक के बजट का अनुमान।
3)     अभिनेता-अभिनेत्रिओं का चयन।
4)     समूह के साथ आलेख का पठन।
5)     प्रस्तुति की शैली का निर्धारण।
6)     विभिन्न सहयोगीयों, जैसे - लाइट डिज़ाइनर, कॉस्टयूम डिज़ाइनर आदि का चयन।
प्रस्तुति(production) के अंतर्गत आता है :
1)    पूर्वाभ्यास
2)    सेट डिज़ाइनर, लाइट डिज़ाइनर, कॉस्टयूम डिज़ाइनर, साउंड डिज़ाइनर से अपनी परिकल्पना समझाते हुए बातचीत करना। रिहर्सल दिखाना और आवश्यक डिज़ाइन करने का निर्देश देना।
3)    रूप-सज्जक से बातचीत और निर्देश।
4)    प्रस्तुति नियंत्रक के साथ ग्रांड रिहर्सल करवाना।
5)    प्रस्तुति का निरीक्षण।
प्रस्तुति-पश्चात (postproduction) :
इस भाग में निर्देशक प्रस्तुति की समीक्षा करता है और प्रस्तुति में उपुक्त सामाग्री को पुनर्व्यवस्थित करवाता है।
ये सिद्धान्त की बातें थी। अब हम व्यवहार की बातें करते हैं। कई बार ऐसा होता है कि प्रोड्यूसर और डाइरेक्टर दो अलग-अलग व्यक्ति होते हैं, खासकर प्रोफेसनल थिएटर में। ऐसी स्थिति में स्क्रिप्ट और अभिनेता-अभिनेत्री के चयन में निर्देशक को स्वतन्त्रता नहीं रहती है।साधारणतः चयन प्रोड्यूसर के हाथ में होता है और निर्देशक को उसी के अनुसार काम करना होता है। हाँ कुछ विवेकी प्रोड्यूसर निर्देशक से सलाह लेते हैं या उसे ही चयन का अधिकार दे देते है। यह एक आदर्श स्थिति कही जा सकती है। इस स्थिति में या एमेच्योर थिएटर में जहां निर्देशक स्वतंत्र होता है, उसकी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है क्योंकि प्रस्तुति की सफलता और असफलता का दारोमदार उसी पर समझा जाता है। अतः आलेख और अभिनेताओं के चयन में निर्देशक को समझदार होना चाहिए। आलेख के चयन के लिए निर्देशक को कुछ प्रश्नों का उत्तर स्वयं से पूछना चाहिय। ये प्रश्न हैं, प्रस्तुति कहाँ होगी? कब होगी? किसलिए होगी? और किसके साथ होगी ? इन प्रश्नों के सही उत्तर मिल जाने से प्रस्तुति का स्थान, समय, कारण और सहयोगियों के विषय में जानकारी मिल जाती है। इन बातों के स्पष्ट हो जाने से अच्छा और सटीक आलेख चुनना संभव हो जाता है। प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए एक मुहावरा कहा जाता है, ‘सटीक विषय तो आधी सफलता तय’। आलेख का चुनाव हो जाने के बाद निर्देशक को चाहिए कि वह आलेख का कई बार अध्ययन करे, उसका विश्लेषण करे। इससे वह आलेख मे छिपी सूक्ष्म बातों को, द्वंद और चरित्रों के मनःस्थिति को प्रभावशाली तरीके से समझ सकेगा। इन बातों को समझे बिना उम्दा प्रस्तुति असंभव होती है। इन बातों को समझकर निर्देशक को प्रस्तुति कि शैली निर्धारित करना चाहिए। इसके बाद आलेख का पठन समूह मे करवाना चाहिए। इस दौरान ‘बिट्वीन द लाइन’ आदि पर नोट लेना चाहिए।  समूह में एक से अधिक बार पठन के उपरांत ही अभिनेताओं को भूमिका वितरित करना चाहिए। समूह में आलेख के पठन से यह तय करने में आसानी होती है कि कौन अभिनेता किस चरित्र के साथ न्याय कर सकता है। भूमिका के वितरण में किसी भी तरह का दबाव और व्यक्तिगत संबंधो से निरपेक्ष रहना ही निरापद होता है। अन्यथा चरित्र के सापेक्ष अनुपयुक्त अभिनेताओं के चुनाव कि संभावना अधिक हो जाती है। अनुपयुक्त अभिनेताओं के चुनाव का परिणाम आसानी से समझा जा सकता है।
अभिनेताओं के चुनाव के बाद आलेख का एक दो पाठ भूमिकानुसार समूह में ही करवाना चाहिए और इस दौरान निर्देशक को डिक्शन पर काम करना चाहिए। फिर थोड़ा समय देकर अभिनेताओं से उनके संवाद याद करवाना चाहिए। इसके बाद रिहर्सल शुरू करना चाहिए। रिहर्सल के दौरान समूहन कार्य भिन्न-भिन्न निर्देशक अपने अनुभव और सुविधा के अनुसार करते हैं। समूहन होने तक अगर उसकी प्रारम्भिक परिकल्पना में कोई परिवर्तन हुआ हो तो उसे नोट करके नाटक का व्यवस्थित ढांचा तैयार कर लेना चाहिए।  इसके बाद लाइट डिज़ाइनर और सेट डिज़ाइनर को रिहर्सल दिखाकर अपनी जरूरत समझाना चाहिए और डिज़ाइन के लिए आवश्यक निर्देश देना चाहिए। प्रॉपर्टि सहायक को प्रॉपर्टि जमा करने का निर्देश और कॉस्टयूम इंचार्ज को कॉस्टयूम कि व्यवस्था करने का निर्देश देना चाहिए। थोड़े दिन रिहर्सल के बाद साउंड डिज़ाइनर से साउंड डिज़ाइन करवा लेना चाहिए। अंततः जरूरत अनुसार फ़ाइनल रिहर्सल(रन-थ्रू) करवाकर लाइट, साउंड कॉस्टयूम और संभव हो तो सेट के साथ ग्रांड रिहर्सल करवाना चाहिए। फ़ाइनल रिहर्सल से प्रस्तुति नियंत्रक को साथ रखना अनिवार्य होता है। अब बारी आती है प्रस्तुति की। प्रस्तुति के दिन निर्देशक को तानावमुक्त रहकर प्रस्तुति देखना चाहिए। लेकिन ऐसा कम ही हो पता है। और अगर निर्देशक स्वयं प्रस्तुति नियंत्रक हो तब तो असंभव ही है। प्रस्तुति के अगले दिन समूह के साथ बैठकर प्रस्तुति की समीक्षा करनी चाहिए। समीक्षा भविष्य में प्रस्तुति के दुहराव में होनेवाली त्रुटियों की कमी में सहायक होती है। समीक्षा के दौरान प्रस्तुति की अच्छाइओं का श्रेय पूरे समूह को देना चाहिए और गलतियों पर बिना विवादी हुए विचार करना चाहिए।
निर्देशन के व्यवहारिक पक्ष को प्रभावित करनेवाली अन्य बातें होती है, निर्देशक के ज्ञान का स्तर, सीमाओं को समझने की क्षमता, मानव मानोविज्ञान की समझ, विवादों को सुलझाने और सामंजस्य बैठाने की क्षमता, उत्साह और कम संसाधन में अधिक परिणाम देने का नजरिया आदि।
जब निर्देशक ही प्रोड्यूसर होता है तो बजट और मंच की व्यवस्था, प्रशासन से सुरक्षा की मांग, अतिथियों को आमंत्रित करना और प्रचार-प्रसार का कार्य की रूप-रेखा भी उसे ही तैयार करना पड़ता है।
निष्कर्षतः हम कह सकते है कि नाट्य निर्देशन का काम बहुत ही जटिल होता है। इसके लिए प्रयाप्त ज्ञान और रचनात्मक सोच के साथ-साथ व्यवहार कुशलता की भी आवश्यकता होती है।




संदर्भ :
1॰ नाट्यप्रस्तुति एक परिचय       लेखक – रमेश राजहंस।
२॰ कक्षा-व्याख्यान                डॉ॰ विधु खरे दास।
३॰ कक्षा-व्याख्यान                हरीश इथापे।
४॰ कक्षा-व्याख्यान                प्रवीण कुमार गुंजन।



 


उत्तर-आधुनिकता का नाटकीय परिप्रेक्ष्य



“उत्तर-आधुनिकता का नाटकीय परिप्रेक्ष्य” को समझने के लिए हमें पहले उत्तर-धुनिकता पर विचार करना होगा। आखिर उत्तर-आधुनिकता है क्या, और इसका स्वरूप कैसा है? वर्तमान में उत्तर-आधुनिकता शब्द का प्रयोग जिस स्थिति के लिए होता है वह विवादास्पद है। एक वर्ग इसका अर्थ ‘आधुनिकता से मुक्ति’ की स्थिति मानता है तो दूसरा वर्ग “आधुनिकता के बाद की स्थिति”। यूरोपीय चिंतकों ने इसे आधुनिकता के बाद की स्थिति मानते हैं और यही मत धीरे-धीरे रूढ़ होता जा रहा है। इस मत को व्याख्यायित करनेवाले चिंतक है : ल्योतार, बौद्रिया, फेडरिक जेमसन, फूको, देरीदा आदि। उत्तर-आधुनिकतावाद को ल्योतार महावृतांत (ईसाइयत, मार्क्सवाद और वैज्ञानिक मिथ) का अंत कहते हैं। फेडरिक जेमसन ने इसे पूंजीवाद की खास अवस्था माना है और कहा है — “ज्ञान की अवस्था बदल जाती है जब समाज उत्तर-औद्योगिक युग में और संस्कृति उत्तर-आधुनिक युग में प्रवेश करती है। यह बदलाव 1950 के दशक के अंत से चालू है।” फेडरिक जेमसन के इस विचार से यह स्पष्ट हो जाता है की उत्तर-आधुनिकता भी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की स्थिति है जब आधुनिकता की स्थिति में चरम पर पहुँची तार्किकता और बौद्धिकता भी जीवन का आकलन करने में सक्षम नहीं हो सकी। इस स्थिति को विखंडन की स्थिति मानी गई। नीत्शे ने तो ईश्वर को पहले ही मार दिया था। उत्तर-आधुनिकता की व्याख्या करते हुए देरीदा ने मनुष्य की भी मृत्यु की घोषणा कर दी। यानि अब भावना, नैतिकता, तर्क और बुद्धि का मूल्य समाप्त हो गया है। इतना ही नहीं उत्तर आधुनिकता की स्थिति में कला, साहित्य, इतिहास के साथ-साथ लेखक को भी मृत मान लिया गया है। विखंडन को मान्यता मिलने के चलते आलेख की अर्थवातता भी बदलने लगी है।
उत्तर-आधुनिकता में पूंजीवाद के लगातार विकास से बाजार ने भौगोलिक सीमाओं का उलंघन कर दिया है। उपभोक्तावादी प्रवृति ने पूरी तरह से पाँव पसार लिया है। इसके साथ ही संचार-क्रांति के विविध आयामों ने मिलकर ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा विकसित की है। ‘ग्लोबल विलेज’ ने बाजार को इतना मजबूत कर दिया है कि अब हर चीज बिकाऊ हो गई है। आज कला, संस्कृति, शिक्षा, खेल, ज्योतिष, अपराध, फांसी, तलाक से लेकर देशभक्ति और भगवान तक बिकने लगे हैं। बाजार प्रायोजित उपभोगतावाद के साथ मानवाधिकारों का तड़का लगाए जाने से एक ऐसी यौन संस्कृति विकसित होने लगी है जिसमे पुरुष और स्त्री को शिश्न और योनि का प्रतीक मात्र समझा जाने लगा है।
उपरोक्त कारणों से आज मानवता के विरुद्ध कई चुनौतियाँ सिर उठाकर खड़ी हो गई हैं। ये चुनौतियाँ हैं: बिखराव, बनावटी यथार्थ, खंडित व्यक्तित्व, विकृत यौनिकता, तृष्णा और उससे से उपजी हताशा, प्रकृति और पर्यावरण की गंभीर समस्याएँ, साहित्य, कला और भाषा की निरर्थकता, बाजार का सर्वग्रासी बनते जाना आदि।
नाटक हमेशा से मानवता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों से दर्शकों को रू-ब-रू कराता रहा है। उत्तर-आधुनिकता से प्रभावित नाटकों में दर्शकों को इन चुनौतियों से न केवल आलेख बल्कि डिज़ाइन, शिल्प, शैली और अभिनय के माध्यम से भी रूबरू करवाया जाता है जिसका वर्णन निम्न प्रकार है।
उत्तर-आधुनिकता के आधार मे विखंडन है। बिखंडन के कारण भाषा अपनी अर्थवत्ता खो देती है। इस अवधारणा के चलते उत्तर-आधुनिक नाटकों में अब नाट्यालेख की सत्ता को अस्वीकार करके इंप्रोवाइजेशन को महत्व दिया जाने लगा है। इसका मुख्य कारण है भाषा के बजाय दृश्यातमकता को महत्व देना। इसके पक्ष में कमलेश दत्त त्रिपाठी का कहना है, “ नाटक तभी नाट्य है जब उसे परफ़ार्म किया जाए। प्रयोग नाटक को सत्ता प्रदान करता है। इस प्रकार उत्तर-आधुनिक रंगमंच में प्रयोग की संभावनाओं पर अधिक बल दिया गया है”। दृश्यातमकता को प्राथमिकता के बहाने उत्तर-आधुनिकता ने नाटकों को आलेख की सत्ता से मुक्त करने का प्रयास किया है। भाषा के विखंडन के परिप्रेक्ष्य में अब नाट्यालेखकों और निर्देशकों के संबध पर प्रश्न- चिह्न लगता जा रहा है। अब निर्देशक लेखक और उसके आलेख को प्रस्तुति के लिए आवश्यक नहीं समझते हैं और नाटक को इंप्रोवाइज कर लेते हैं। अधिकांश ऐसे नाटक अभाषिक, शब्द रहित, आलेख रहित होते हैं। या फिर एक ही नाटक में विभिन्न भाषा के शब्द होते हैं। कुल मिलाकर दृश्य को ही भाषा माना जाता है और आलेख को दृश्यतमक आलेख या विजुअल टेक्स्ट।
उत्तर-आधुनिकता से प्रभावित नाटकों के विषय भी उसकी स्थितियों से मेल खाते है। इन नाटकों में बाजारवाद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, मानसिक रुग्णता, वर्ग संघर्ष, जातीय अस्मिता, सांप्रदायिकता, विकृत यौनिकता, समलैंगिकता, तृष्णा, हताशा और सम्बन्धों के विखंडन और इसके प्रभाव आदि का ही चित्रण होता  है।
भाषा और पाठ की उपेक्षा और दृश्यात्मकता को प्राथमिकता देने के कारण उत्तर-आधुनिक नाटकों में विन्यास के मायने बदल जाते हैं। निर्देशक सम्पूर्ण विषय के अनुरूप विन्यास नहीं करके अपनी सोच, दृष्टिकोण, अनुभव और वैचारिकता के अनुसार विन्यास करता है। पूरे विन्यास से विखंडन प्रतिबिम्बित होता रहता है। मंच पर अतार्किक मेटाफर जटिल प्रतीकों के साथ-साथ कटआउट, पोस्टर्स, मल्टीमीडिया, क्राफ्ट, इलेस्ट्रेसन आर्ट, एल सी डी प्रॉजेक्टर, विसंगत प्रकाश, मानवीय ध्वनि आदि का प्रयोग किया जाता है। इन सब चीजों की कोई निश्चित सीमा नहीं होती है। कई नाटकों में पॅलिथीन-ग्लोब, सर्कस का टेंट, ठेला, रेहड़ी आदि का प्रयोग भी देखा गया है। कभी बिना आलेख के, कभी मौन, कभी चीख़ों के साथ ऐसे नाटकों में अभिनय किया गया है। कभी-कभी अभिनेताओं को लेकर भी प्रयोग किया जाता है। मँजे हुए कलाकारों के बदले अंध-अपंग गूंगे-बहरे, बौने, वेश्याएँ, मजदूर, मानसिक रोगी, मतिमंद, रिमांड होम के बच्चे आदि से भी अभिनय करते देखे गए हैं। अभिनेता कभी बिना आलेख के, कभी मौन, कभी चीख़ों के साथ, कभी ताल-लय के साथ, कभी वस्त्र-आभूषण के साथ तो कभी नंगे देह भी अभिनय करते देखे जाते हैं। इन सब बातों का निर्धारक निर्देशक होता है। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि उत्तर-आधुनिक नाटकों में क्या, कैसा होगा यह कहना मुश्किल होता है लेकिन जो भी होता है उससे संबन्धित प्रश्नों का उत्तर निर्देशक पास होता है। सबसे महत्वपूर्ण एक बात जो सब नाटकों में समान होती है वह है, प्रतिरोध का स्वर। इन नाटकों को देखते समय और कुछ समझ मे आए न आए लेकिन प्रतिरोध स्पष्ट समझ में आता है।
उत्तर-आधुनिक नाटकों मे अतार्किक सामाग्री और स्थितियों के माध्यम से अपनी बात कहना और प्रतिरोध प्रतिध्वनित करने की विशेषता को अब ‘न्यू लैंग्वेज थिएटर’ की संज्ञा दी जाने लगी है। भले ही यह लैंग्वेज़ सबको समझ में आए या नहीं आए लेकिन समकालीन रंगकर्मियों के प्रयोगों मे इसका चलन बढ़ता जा रहा है।
उत्तर-आधुनिकता से प्रभावित नाटक विदेशों में बहुत पहले से होने लगा। पिछले दशक से भारत में भी इसका प्रभाव दिखाई पड़ने लगा। लेकिन एनएसडी द्वारा प्रायोजित भारतीय रंग महोत्सव (भारांगम-2012) में प्रस्तुत कई नाटकों की शृंखला में इसका प्रभाव समग्रता से देखा गया। अब देश में ऐसे नाटकों का प्रदर्शन जोड़ पकड़ता जा रहा है।


संदर्भ :
1.     हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली।                  लेखक – डॉ॰ अमरनाथ।
2.     पाश्चात्य काव्यशास्त्र के सिद्धान्त।                         लेखक – डॉ॰ मैथिलीप्रसाद भारद्वाज।










मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

कॉपीराइट एक्ट की विशेषताएँ

किसी भी सृजनात्मक कार्य का कर्ता यानि कलाकार का सृजन का मुख्य उदेश्य मूलतः तीन ही होते हैं : स्वांतः सुखाय अर्थात आनंद, यशोपार्जन या फिर अर्थोपार्जन। कलाकार को आनंद तो सृजन के क्षणों मे मिल जाता है लेकिन अगर बाद में उसकी कृति चोरी हो जाए या अन्य व्यक्ति दावा करने लगे तो उसका यश लाभ और अर्थोपार्जन बाधित हो जाता है। कोई भी कृति कलाकार के मानस की उपज होती है। उसे भौतिक रूपकार प्रदान करने में लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक श्रम की आवश्यकता होती है। इस प्रकार कृति कलाकार द्वारा अर्जित सम्पदा होती है। वास्तव में कृति का मूलाधार कलाकार की बौद्धतिकता होती है इसलिए उसे बौद्धिक संपदा कहा जाता है। बौद्धिक सम्पदा पर अधिकार और संगत लाभ से अगर रचनाकार वंचित हो जाए तो उसके के मौलिक अधिकारों का हनन होता है और यह स्थिति मानहानिकारक भी होती है। अगर कोई किसी के अधिकारों का हनन करे या फिर मानहानि करे तो यह कृत्य अपराध होता है।
पुराने समय में बौद्धिक सम्पदा से जुड़े अपराध जटिल नहीं होते थे। प्रिंटिग प्रेस के आविष्कार नें पुस्तकों की हजारों लाखों प्रतियाँ छपना संभव बना दिया। इसलिए एक ऐसे कानून की आवश्यकता महसूस की गई जो प्रतिलिपि का अधिकार सुनिश्चित करता हो। फलतः कॉपीराइट एक्ट बना।
कॉपीराइट एक्ट या प्रतिलिपि अधिकार अधिनियम, 1847 भारत का इस विषय पर पहला कानून था जो 1911 तक बना रहा। इसके बाद इंगलिश कॉपीराइट एक्ट 1911 भारत में 31 अक्तूबर, 1912 से लागू किया गया। 1914 में भारतीय विधानमंडल ने इंग्लिश कॉपीराइट एक्ट, 1911 के प्रावधानों को सम्मिलित करके भारतीय कॉपीराइट अधिनियम, 1914 लागू किया। जब इंग्लिश एक्ट, 1911 को इंग्लिश कॉपीराइट एक्ट, 1956 द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया तो भारतीय अधिनियम को बदलना आवश्यक हो गया। इसलिए आज का कॉपीराइट एक्ट, 1957 में बना जो पूरी तरह से भारतीय है।
कॉपीराइट एक्ट, 1957 में अब तक पाँच बार (1983,1984,1992,1994 और 1999 ) संशोधन किया गया है। वर्तमान कॉपीराइट एक्ट, 1999 में संशोधित होकर 15 जनवरी 2000 से लागू है।
वर्तमान कॉपीराइट एक्ट एक व्यापक कानून है। इस अधिनियम के अनुसार, शब्‍द 'कॉपीराइट' का अर्थ है कोई कार्य को करने या उसका पर्याप्‍त भाग करने या प्राधिकृत करने का एकमात्र अधिकार। इसके अंतर्गत,
  • ·        साहित्यिक रचना
  • ·        नाट्य रचना
  • ·        संगीत रचना
  • ·        कलात्मक रचना
  • ·        चलचित्र रचना
  • ·        ध्वनि रिकार्डिंग
  • ·        कम्प्युटर से जुड़ी रचनाएँ जैसे सारणी, डाटाबेस आदि

के स्त्वाधिकार, संबन्धित अपराध और दंड के लिए नियम निर्धारित किए गए हैं। मोटे तौर पर यह इस अधिनियम की विशेषता मानी जा सकती है। लेकिन इस अधिनियम की विशेषताओं को थोड़े गहराई से समझने के लिए इसके प्रावधानों की जानकारी आवश्यक है।
कॉपीराइट एक्ट के प्रावधानों के अध्ययन के बाद जो विशेषताएँ परिलक्षित होती है वे निम्नलिखित हैं :
·        प्रतिलिपि अधिकार रजिस्ट्रार के अधीन एक प्रतिलिपि अधिकार कार्यालय खोला जाएगा जो केंद्र सरकार के निरीक्षण में उसके निर्देशानुसार कार्य करेगा। इस कार्यालय का मुख्य कार्य एक प्रतिलिपि अधिकार रजिस्टर को बनाए रखना होगा जिसमें लेखकों की इच्छा पर उनके नाम, पते, उनके प्रतिलिपि अधिकार तथा अन्य जानकारियाँ लिखी होंगी। यह रजिस्टर आम जनता की जानकारी की लिए उपलब्ध रहेगा। प्रतिलिपि अधिकार के रजिस्ट्रेशन को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक बनाया गया है।
·        यदि किसी को प्रतिलिपि अधिकार के उलंघन का मुकदमा या कोई कानूनी प्रक्रिया करनी हो तो यह तब तक नहीं होगा जबतक उसकी कृति प्रतिलिपि अधिकार कार्यालय में रजिस्टर्ड नहीं होगी।  
·        प्रतिलिपि रजिस्ट्रार का यह कर्तव्य होगा कि वह आवश्यक लाइसेन्स के आवेदनों को सुने एवं उसका निबटारा करे तथा ऐसी शिकायतों कि जांच-पड़ताल करे जो प्रतिलिपि अधिकार के उलंघन  से संबन्धित हो। इस अधिनियम में प्रतिलिपि अधिकार रजिस्ट्रार के विरूद्ध प्रतिलिपि अधिकार बोर्ड में अपील का भी प्रावधान है।
·        यह अधिनियम प्रतिलिपि अधिकार बोर्ड को यह अधिकार देता है कि वह किसी प्रदर्शन करनेवाले कलाकार या सोसाइटी की फीस की दर, खर्चे या रायल्टी तय करेगा, किसी कीर्ति को आम लोगों में प्रदर्शित करने के लाइसेंसों के आवेदन पर गौर करेगा और कुछ खास परिस्थितियों में मुआवजे तय करेगा। प्रतिलिपि अधिकार बोर्ड के आदेश के खिलाफ अपील उच्चन्यायालय में की जा सकेगी।
·        प्रतिलिपि अधिकार शब्द की व्याख्या का विस्तार करते हुए इस अधिनियम में रेडियो डिफ़्यूजन द्वारा संचार करने का एकाधिकार भी शामिल किया गया है।
·        एक सिनेमैटोग्राफ फिल्म का उसकी कहानी, संगीत आदि के प्रतिलिपि अधिकार से स्वतंत्र अपना अलग प्रतिलिपि अधिकार होगा।
·        यदि कोई लेखक अपनी रचना का प्रतिलिपि अधिकार किसी को दे देता है तो इस अधिनियम के तहत उसे पुनः वापस पा सकता है बशर्ते प्रतिलिपि अधिकार कि तारीख से सात वर्ष बीत चुके हों लेकिन यह दस वर्ष से पहले हो और उसे करारनामे के समय ली गई राशि को सूद सहित वापस करना होगा।
·        सामान्य स्थिति में प्रतिलिपि अधिकार कि स्थिति लेखक के जीवनपर्यंत और मरने के बाद पचास वर्ष बाद तक है जबकि अंजान और दूसरे नाम से प्रकाशित लेखकों के लिए यह अवधि कम है।
·        वर्तमान अधिनियम में, भारत छपी कृति अगर दस वर्ष से पहले अनूदित हो गई हो तो उसके अनुवाद का अधिकार दस वर्ष बाद खत्म हो जाता है।
·        किसी भी एलेक्ट्रोनिकल या मेकेनिकल माध्यम से किसी कृति के जनमंचन के लिए आम या खास लाइसेन्स का प्रावधान है।
·        पुस्तकालयों को यह अधिकार दिया गया है कि अगर प्रतिलिपि अधिकार प्राप्त पुस्तक की अन्य प्रति उपलब्ध नहीं हो तो वह उसकी एक कॉपी करावा सकता है।
·        जनमंचन करनेवाली संस्थाओं की गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए, उनके द्वारा फीस , खर्चे एवं रायल्टी लेने पर प्रावधान बनाए गए हैं।
·        प्रतिलिपि अधिकार से मिलते-जुलते कुछ अधिकार ब्रॉडकास्टिंग अधिकारियों को भी दिया गया है।
·        किसी कृति का रेडियो या न्यायिक प्रक्रिया द्वारा उचित प्रयोग प्रतिलिपि अधिकार का उलंघन नहीं है।
·        अंतरराष्ट्रीय कॉपीराइट संबंध जो अंतरराष्ट्रीय संधियों पर आधारित है उनको केंद्र सरकार द्वारा इन विषयों पर प्रदत आदेशों के अनुसार नियंत्रित किया जाएगा।



संदर्भ :
1.  कक्षा व्याख्यान – सतीश उपाध्याय।
2.  कॉपीराइट – कमलेश जैन।
3.  इंटरनेट (ब्लॉग, कानूनी पहल)।

     

ड्रमैटिक एक्ट 1876 की प्रासंगिकता

mohanstudy.blogspot.com
ड्रमैटिक एक्ट 1876 यानि ‘नाट्य प्रदर्शन अधिनियम 1876’, 16 दिसम्बर 1876 को तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के द्वारा लाया गया था। अन्य अधिनियमों के भांति इस अधिनियम में भी दो भाग है। प्रथम भाग में अधिनियम में जो धाराएँ हैं उनकी सूची और दूसरे भाग में धाराओं के अंतर्गत प्रावधान वर्णित है। इस अधिनियम मे कुल 12 धाराएँ हैं। उन धाराओं में जो प्रावधान हैं वे संक्षेप में इस प्रकार हैं:

·       पहली धारा में यह बताया गया है कि “इस अधिनियम को नाट्य प्रदर्शन अधिनियम 1876 कहा जाएगा।
·        दूसरी धारा में, मजिस्ट्रेट के बारे में बताया गया है जो अधिनिम के तहत कारवाई का अधिकारी होता था। इस मजिस्ट्रेट का मतलब तब के प्रेसीडेंसी नगरों में पुलिस मजिस्ट्रेट और अन्य जगहों पर जिला मजिस्ट्रेट से था।
·        तीसरी धारा में, वैसे खेल, मूकाभिनय या नाट्य जिसका स्वरूप कलंकात्मक या मानहानिकारक हो; विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति दुर्भावना व्यक्त करनेवाला हो या फिर भ्रष्ट आचरण और दुराचार को बढ़ावा देनेवाला हो। ऐसे प्रदर्शनों को प्रतिषिद्ध यानि प्रतिबंधित करने का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया है। इस धारा में एक स्पष्टीकरण भी है जिसमें वैसे भवनों और स्थानों को भी सार्वजनिक स्थल माना गया है जहां लोग लोग पैसे देकर प्रदर्शन देखने आते हों।
·        चौथी धारा में, प्रतिबंधित प्रदर्शनों में भाग लेनेवाले व्यक्ति पर और जहां ऐसा प्रदर्शन होने की संभावना हो, उस स्थल के मालिक अगर जान बूझकर प्रदर्शन होने देता हो तो उस पर  मजिस्ट्रेट के सामने आरोप सिद्ध हो जाने की स्थिति में दंड का प्रावधान है। दंड, तीन महीने तक का कारावास, जुर्माना या फिर दोनों हो सकता था।
·        पाँचवीं धारा में, प्रतिबंधित प्रदर्शन की जानकारी देने के लिए उद्घोषणा करने या सार्वजनिक जगहों पर लिखित नोटिस चिपकाने को अधिसूचित किया गया है ताकि जाने-अनजाने ऐसे प्रदर्शनो को देखने से लोगों को रोका जा सके।
·        छठी धारा में, प्रदर्शन प्रतिबंध अधिसूचित होने के बाद भी उसमें शामिल होनेवाले लोगों पर और प्रदर्शन स्थल के मालिक पर, मजिस्ट्रेट के आगे आरोप तय हो जाने की स्थिति में दंड का प्रावधान है।
·        सातवीं धारा में यह बताया गया है कि कोई भी संभावित प्रदर्शन से पूर्व उस प्रदर्शन का स्वरूप निर्धारित करने के लिए राज्य सरकार या सक्षम अधिकारी उस प्रदर्शन से जुड़े व्यक्तियों, मुद्रक या स्थल के मालिक से जानकारी मांग सकेगा। जिससे जानकारी मांगी गई हो, जानकारी देने के लिए बाध्य होगा। जानकारी नहीं देने कि स्थिति में उसे तब की धारा 176 के तहत अपराधी माना गया है।
·        आठवीं धारा में यह कहा गया है, अगर मजिस्ट्रेट को विश्वास करने का कारण हो कि किसी स्थल पर, इस अधिनियम के तहत प्रतिबंधित प्रदर्शन होता है तो वह वारंट द्वारा पुलिस के किसी अधिकारी को प्राधिकृत करेगा जो अपनी सुविधानुसार या बलपूर्वक उस स्थल पर प्रवेश करके उपस्थित व्यक्तियों को गिरफ्तार और शक के आधार पर उस प्रदर्शन में उपयोगी समग्रियों को जब्त कर सकेगा।
·        नौवीं धारा में यह प्रावधान है कि इस अधिनियम के अधीन दोष सिद्ध कोई भी भारतीय दंड संहिता (1850,45) की धारा 124क और 294 के तहत अभियोजना को वर्जित नहीं कर सकेगा।
·        दसवीं धारा में सरकार को यह शक्ति प्रदान किया गया है कि यदि किसी क्षेत्र में उसे आवयशक लगे तो वह अधिसूचित कर सकती है कि उस क्षेत्र में कोई भी प्रदर्शन, सक्षम अधिकारी से अनुज्ञप्ति (लाइसेन्स) के बिना नहीं किया जाएगा। पाठ की एक प्रति या यदि मूकाभिनय हो तो उसका विवरण कम से कम तीन दिन पहले सक्षम अधिकारी को देना होगा। अगर प्रदर्शन को अनुज्ञप्ति प्राप्त नहीं हो तो प्रदर्शन स्थल के मालिक पर दंदात्मक कार्यवाई कि जाएगी।
·        ग्यारहवीं धारा में गवर्नर जनरल द्वारा प्रयोक्त शक्तियाँ बताई गई हैं।
·        बरहवीं और अंतिम धारा में यह बताया गया है कि इस अधिनियम की कोई बात धार्मिक उत्सवों में, कोई यात्रा या उसी प्रकार के प्रदर्शन पर लागू नहीं होगी।
इस अधिनियम के उदेश्य और कारणों को कथन करते हुए एक विज्ञप्ति 9 मार्च 1876 को कलकत्ता से निकाला था जिसके अधोहस्ताक्षरी ए॰ हाबहाऊस थे। जैसा हर अधिनियम में व्यवस्था को आदर्श स्थिति में लाने की बात की जाती है वैसे ही उस विज्ञप्ति में भी यह कहा गया था - “इस विधेयक का मूल उदेश्य सरकार को ऐसे स्थानीय नाटकों को प्रतिषिद्ध करने लिए सशक्त करना है जो कलंकात्मक, मानहानिकारक राजद्रोहात्मक और अश्लील हैं। ऐसा कोई आद्योपाय आवश्यक है। यह बात कलकत्ता में एक गंदे बंगाली ड्रामा के प्रदर्शन से सिद्ध हो चुकी है जिसे निवारित करने में वर्तमान विधि अपर्याप्त थी”।  
जिस समय यह अधिनियम लाया गया था तब समाज में इतनी अश्लीलता नहीं थी। उस समय पारसी कंपनियों का भी शुरुआती चरण ही था। शुरुआती चरण के पारसी नाटकों में शायद ही अश्लीलता होती थी। जब हम इस अधिनियम के प्रावधानों का अध्ययन सूक्ष्मतापूर्वक करते हैं तथा तत्कालीन राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर विचार करते हैं तो आसानी से समझ जाते हैं कि यह अधिनियम बुरे प्रदर्शनों की आड़ में अँग्रेजी सत्ता के विरुद्ध उठनेवाली किसी भी आवाज को दमन करने के लिए ही बनाया गया था। उस समय अँग्रेजी सत्ता के विरुद्ध आवाज उठाना राजद्रोह था और इस अधिनियम में राजद्रोह के लिए शास्तियों (दंड) का उल्लेख है। भारतीय समाज गर्त में चला जाएगा इसकी चिंता अँग्रेजी सरकार को कितनी थी, यह सर्व विदित है। अंग्रेज़ो ने भारत में जो भी किया अपने लाभ के लिए किया बस पर्दा भारत की बेहतरी का होता था। ऐसे बहुत दस्तावेज़ हैं जो इस तथ्य का समर्थन करते हैं। कुछ उदाहरणों का वर्णन प्रख्यात रंग चिंतक महेश आनंद द्वारा संकलित “रंग दस्तावेज़ सौ साल” पुस्तक के खंड 2 में, रंगपरिवेश नामक दूसरे अध्याय के प्रथम लेख “नाट्यप्रदर्शन अधिनियम-1876 और रंगमंच” में किया गया है। इसी अधिनियम के चलते ‘नीलदर्पण’ नाटक प्रतिबंधित हुआ। प्रचार में सहायक होने के कारण ‘माइकल मधुसूदन दत्त’ को सुप्रीम कोर्ट की नौकरी छोड़नी पड़ी। न केवल सैकड़ों नाटक बल्कि रामलीला तक प्रतिबंधित किए गए। यह अधिनियम गुलाम भारत में आजादी कि भावना को दमन करने का प्रमुख अस्त्र बना रहा।
इस अधिनियम में जो अच्छी बातें परिलक्षित होती है अंग्रेजों ने चाहे उसका जैसा उपयोग किया हो लेकिन स्वतंत्र भारत में इसी अधिनियम के आलोक में बुरे प्रदर्शनो को सेंसर करने के लिए कानून बना क्योंकि किसी की मानहानि, कलंकात्मकता, अश्लीलता और राजद्रोह किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं हो सकता। ये बुराइयाँ मानवता की दुर्दशा और देश में अराजक स्थिति उत्तपन्न कर सकती हैं।
स्वतन्त्रता के बाद प्रदर्शनों को सेंसर करने के लिए लगभग सभी राज्यों में कानून बनाए गए। विभिन्न राज्यों के कानून के प्रारूप में थोड़ा बहुत जो फर्क हो लेकिन आत्मा एक ही है। ये सभी कानून जनता को मौलिक अधिकारों के तहत अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को अतिक्रमित किए बिना बुरे प्रदर्शनों को रोकने मे सक्षम हैं। ब्रिटिश कानून में जो अधिकार मजिस्ट्रेट को प्राप्त था आधुनिक कानून में वह अधिकार मुनिसिपल कमेटी और कलेक्टर को प्राप्त है। कई बार मौलिक अधिकारों के हनन का आरोप लगने के कारण इन कानूनों में संशोधन भी किए गए हैं। हालांकि कानून कितना भी आदर्श हो बुरी व्यवस्था तोड़ निकाल ही लेती है।
बहरहाल, स्वतंत्र भारत में  प्रदर्शनों को सेंसर करने के लिए नए कानून बन जाने के कारण  ‘ड्रमैटिक एक्ट 1876’ अपने मूल प्रारूप में अप्रासंगिक हो गई है लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व तो है ही।





संदर्भ :
1.  कक्षा व्याख्यान – सतीश उपाध्याय।
2.  रंग दस्तावेज़ सौ साल – महेश आनंद।
3.  इंटरनेट से उक्त अधिनियम की प्रति।