शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

षडंग : भारतीय चित्रकला का आधार




रूपभेदः प्रमाणानि भावलावण्ययोजनम।
सादृश्यं वर्णिकाभंग इति चित्रं षडंगकम्।।

वात्स्यायन विरचित कामसूत्र में वर्णित उपरोक्त श्लोक में आलेख्य यानि चित्रकर्म के छह अंग, रूपभेद, प्रमाण, भाव, लावण्ययोजना, सादृश्य और वर्णिकाभंग को बताया गया है। जयपुर दरबार के प्रख्यात विद्वान यशोधर पंडित ने कामसूत्र की टीका रूप में जयमंगला नामक ग्रंथ की रचना की थी। उस ग्रंथ में उन्होने चित्रकर्म के षडंग की विस्तृत विवेचना की है। प्राचीन भारतीय चित्रकला में यह षडंग हमेशा ही महत्वपूर्ण और सर्वमान्य रहा है। आधुनिक चित्रकला पर पाश्चात्य प्रभाव पड़ने के वावजूद भी यह महत्वहीन नहीं हो सका। क्योंकि षडंग वास्तव में चित्र के सौन्दर्य का शाश्वत आधार है। इसलिए चित्रकला का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन के लिए इसकी जानकारी आवश्यक है। षडंग के अंतर्गत आनेवाले सभी अंगों का वर्णन निम्नलिखित हैं।
रूपभेद :
वह गुण जिसके कारण किसी आकृति में सौंदर्य अभिव्यक्त होती है उस गुणविशेष को रूप समझा जाता है। रूप को किसी परिधि में नहीं बंधा जा सकता है। वह अनंत होता है। उसे सिर्फ दो माध्यमों, आँख और आत्मा के द्वारा पहचाना जाता है। किसी वस्तु के रंग और आकार को आँखों के द्वारा पहचानते हैं जबकि उसके अंदर निहित गुणों को हम चिंतन-मनन कर आत्मा के द्वारा अनुभव करते हैं। रूप से पहला परिचय आँखों का ही होता है। आत्मिक अनुभूति उसके बाद होती है। किसी भी कलाकृति के बाहरी गुण-दोषों की समीक्षा आँखों से होती है लेकिन उसके आंतरिक गुण-दोषों की समीक्षा आत्मा द्वारा ही संभव होता है।
किसी भी कलाकृति का परीक्षण चाहे बाहरी हो या आंतरिक, हमारे अंदर अभिरूचि का होना बेहद जरूरी है। जब हम किसी वस्तु को देखते हैं तो उसमें निहित अभिरूचि हमारे अंदर की अभिरूचि से मिलकर ही उसके रूप की सुंदरता या असुंदरता का ज्ञान करवाने में समर्थ होता है। वास्तव में अभिरूचि हमारे मन की चिरंतन दीप्ति होती है जिसके द्वारा ही हम रूप को सु और कू में बाँटकर देख पाते हैं। इसलिए प्रत्येक वस्तु को अपनी अभिरूचि से देखना और उस वस्तु में अंतर्निहित सौन्दर्य-रूचि को अपने मन में बैठना रूप का वास्तविक बोध है।
किसी भी कलाकृति की रूप-रेखा जितनी सुंदर होगी वह कलाकृति उतनी ही उत्कृष्ट होगी। किसी भी कृति के रूप में वह गुण होना चाहिए जिससे भिन्न-भिन्न स्वभाव वाले मनुष्यों का समान रूप से मनोविनोद हो सके। ऐसा तभी संभव है जब रूप-भेदों की बारीकियों का सम्यक ज्ञान हो। रूप-भेदों की बारीकियों से अनिभिज्ञ होकर कलाकृति की वास्तविकता को नहीं आँका जा सकता है।
प्रमाण :
चित्रकला के  षडंग का दूसरा अंग है प्रमाण  साधारण अर्थों में प्रमाण, मान, सीमा, कद और लंबाई-चौड़ाई; अर्थात वस्तु की विवरणात्मक स्थिति को समझा जाता है। चित्रकला में भी प्रमाण से चित्र की विवरणात्मक स्थिति का ही भान होता है। उचित प्रमाण होने से ही चित्र द्वारा मूल वस्तु की यथार्थता का ज्ञान होता है। चित्र द्वारा यथार्थबोध हो इसके लिए चित्रकार में उचित प्रमाण-शक्ति होना आवश्यक है। वास्तव में उचित प्रमाण के द्वारा चित्रकार मूल वस्तु और चित्र का अनुपात, जिस आधार पर चित्र बनाता है, उसके सापेक्ष स्थिर करता है। उचित प्रमाण के आभाव में चित्र सौंदर्यहीन हो जाता है।
आँखों के सामने फैले विशाल दृश्य को एक कागज पर चित्र रूप में समेट देना और उस चित्र द्वारा उस विशाल दृश्य का भान प्रमाण के द्वारा ही संभव होता है। किसी कागज को सिर्फ नीले रंग से रंगकर उसके द्वारा समुद्र का आभास करवा देना कतई संभव नहीं हो सकता है। कागज पर समुद्र तभी प्रतीत होगा जब नीला रंग ऐसा हो जो समुद्र की धीर गंभीरता को दिखाने में सक्षम हो और आकाश की नीलिमा से भिन्न हो; रेखाओं के द्वारा उचित आकार प्रदान किया गया हो। यह सब प्रमाण के द्वारा ही संभव हो पाता है। प्रमाण के द्वारा ही हम विभिन्न वस्तुओं जीव-जंतुओं, स्त्री-पुरुषों, देवता-दानव आदि के भेदोपभेद को समझ पाते हैं।  प्रमाण कलाकार के अन्तःकरण का ऐसा मानदंड होता है जिसके द्वारा  वह  सीमित और अनंत दोनों प्रकार के वस्तुओं को माप सकता है।
भाव :
चित्रकला के षडंग में भाव को तीसरा स्थान प्राप्त है। भाव मूलतः अनुभव का विषय होता है।  दर्शन और काव्यशास्त्र में भावों की महत्ता पर शूक्ष्मता और व्यापकता से विचार किया गया है। शरीर इंद्रिय और मन के धर्मों में विकार की स्थिति उत्पन्न करना भाव का काम है। निर्विकार चित्त में प्रथमतः किसी भी तरह का विक्षोभ भाव के द्वारा ही उत्तपन्न होता है। भाव का संबंध किसी-न-किसी विभाव से होता है। भाव एक मानसिक प्रक्रिया है जिसकी अभिव्यक्ति शारीरिक धर्मों द्वारा होती है। मन में जिस भाव का रस उत्पन्न होता है शरीर में उसी के अनुकूल लक्षण प्रकट होने लगते हैं। न केवल मनुष्य का शरीर बल्कि संसार का कोई भी कार्य-व्यापार भाव निरपेक्ष नहीं होता है।
चित्र चाहे जिसका भी उसके द्वारा किसी-न-किसी रूप में सांसरिक परिघटना ही दिखाई पड़ती है। इसलिए चित्र-रचना में भावाभिव्यंजना को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। भिन्न-भिन्न भावों की अभिव्यंजना से कलाकृति में भिन्न-भिन्न विकारों का समावेश होता है। चित्र में भाव, आकृति की भंगिमा और व्यंगात्मक प्रक्रिया से व्यक्त होता है। भावभिव्यंजना के दो रूप होते है : प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न। प्रत्यक्ष भावरूप को हम आँखों से देख पाते हैं जबकि प्रच्छन्न भावरूप का अनुभव व्यंजना द्वारा होता है।
प्रत्यक्ष भावों को कलाकार सहजता से दिखा पता है जबकि अप्रत्यक्ष भावों को दिखाना उसके लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है। अप्रत्यक्ष भावों को दिखा पाने की क्षमता कलाकार की निपुणता का परिचायक होता है। भावों को दिखाने की दक्षता के कारण ही निपुण कलाकारों की कृति में विशिष्टता दिखाई पड़ती है।
लावण्य योजना :
चित्र में लावण्य योजना को चौथा षडंग कहा जाता है। रूप, प्रमाण, और भाव के साथ ही चित्र में लावण्य का होना आवश्यक होता है। रूप की संगति और परिमिति को ही लावण्य कहते हैं। भाव भीतरी सौन्दर्य का बोधक है जबकि लावण्य के द्वारा बाहरी सौन्दर्य अभिव्यंजित होता है। चित्र में बाह्य अलंकृति, कांति और छाया का समावेश लावण्या योजना के द्वार ही संभव हो पता है। चित्र की नयनाभिरामता का कारक लावण्य योजना ही होती है। निर्जीव प्रतिकृति लावण्य-योजना के कारण ही सजीव दिखाई पड़ने लगती है। वास्तव में लावण्य भावों का पोषण और संवर्धन कर के उसकी सौंदर्यानुभूति में वृद्धि करता है।
समुचित रूप, प्रमाण और भावों के बाद भी लावण्यहीनता के कारण चित्रों में सुंदरता एवं सौम्यता का समावेश नहीं हो पता है। लेकिन लावण्य-योजना भी संतुलित ही होनी चाहिए। जिस तरह नमक की कमी या अधिकता भोजन का स्वाद बिगड़ देता है उसी तरह लावण्य की कमी या अतिशयता चित्र के सौन्दर्य को नष्ट कर देता है।
सादृश्य :
चित्रकला के षडंग में पाचवें स्थान पर सादृश्य का स्थान है। प्रतिकृति का जिस गुण के कारण मूल वस्तु से समानता स्थापित होती है उसे सादृश्य कहा जाता है। इसका कार्य होता है किसी रूप के भाव को दूसरे रूप की सहायता से स्थापित करना। लेकिन किसी मूल वस्तु के बाहरी रंग-रूप की अपेक्षा उसके स्वभाव या धर्म का सादृश्य दिखाना ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। कामिनी के मुख और चन्द्र के सादृश्य का यही आधार होता है। कला में संकेतों के प्रयोग के मूल में यह सादृश्य ही होता है।
चित्र में अगर मूल वस्तु के गुण-दोषों का समावेश नहीं होगा तो वह वास्तविक कृति नहीं होगी क्योंकि वह हमारे मन में मूल वस्तु से संबन्धित भाव उत्तपन्न करने में सक्षम नहीं होगी। उदाहरण स्वरूप अगर चित्र में कृष्ण को जटा-जूट या तीर-तलवार के साथ दिखाया जाय तो वह कृष्ण न समझकर कुछ और समझा जाएगा। कृष्ण के लिए सांवला रंग, सलोनी आकृति और कम-से-कम सिर पर मोर पंख का चित्रण तो अनिवार्य ही है तभी सादृश्य की योजना होगी और चित्र विश्वसनीय माना जाएगा। यह स्थूल सादृश्य है लेकिन सूक्ष्म सादृश्य आकृतिपरक न होकर प्रकृति स्वभाव या धर्म की समानता दिखाता है।
चित्र चाहे वास्तविक हो या कल्पना प्रसूत, अगर प्रेक्षकों को उसे पहचाने में कठिनाई नहीं होती है तो वह चित्र शुद्ध माना जाता है। शुद्ध चित्र ही उत्तम चित्र होता है और चित्र तभी शुद्ध हो सकता है जब उसमे सम्यक सादृश्य की योजना हुई हो।
वर्णिकाभंग :
वर्णिकाभंग चित्रकला का अंतिम षडंग है। इसके नाम से ही यह पता चलता है कि यह अंग चित्र में वर्णों (रंग) की योजना के महत्व को बताता है। चित्र में विभिन्न वर्णों के संयोग से जो भंगिमा उत्पन्न की जाती है उसे ही वर्णिकाभंग कहते हैं। वर्णिकाभंग ही हमें यह बताता है कि चित्र में कहाँ किस वर्ण की योजना की जानी चाहिए; किस वर्ण के समीप कौन सा वर्ण होना चाहिए और कौन सा वर्ण किस वर्ण से दूर होना चाहिए। चित्र में उचित वर्णों की योजना से विश्वसनीयता तो आती ही है साथ-ही-साथ एक दूसरे से उनकी समीपता और दूरी उसमें विशिष्ट प्रभाव भी उत्तपन्न करते हैं। इसका कारण यह है कि विभिन्न वर्ण हमारे विभिन्न मनःस्थितियों से जुड़े होते हैं। इसलिए अगर चित्र में वर्णों का उचित संयोजन नहीं हो पाता है तो अन्य अंगो की सम्यक योजना भी निष्फल हो जाती है।
वर्णिकाभंग चित्रकर्म साधना का चरम बिन्दु होता है इसलिए इसे षडगों में अंतिम अंग कहा जाता है। अन्य अंगों की अपेक्षा इसकी साधना समय एवं श्रमसाध्य होती है। इसके लिए लंबे समय तक हाथ में तूलिका लेकर अभ्यास करना होता है। साथ ही वर्णों का ज्ञान भी अपेक्षित होता है।
चित्रकला में प्रमुख वर्ण पाँच माने जाते हैं: उजाला, पीला, लाल, काला और नीला । इन्हीं प्रमुख वर्णों के संयोग से सैंकड़ों उपवर्ण बनाए जाते हैं। किसी भी चित्र में इन्हीं वर्ण-उपवर्णों में से उत्तम वर्णों का चुनाव किया जाता है और हाथ के गंभीर कौशल से उसे संयोजित किया जाता है।
वर्णिकाभंग भंग के लिए लघुता और क्षिप्रता के साथ-साथ हस्तलाघव की भी आवश्यकता होती है। चित्रों में अति सूक्ष्म कार्य जैसे- मांसल सौंदर्य को उभारना, फूलों के सौन्दर्य के साथ उसके सौरभ का आभास करवाना, दिन के विभिन्न प्रहारों में सूर्य के उत्ताप को दिखाना आदि इसी के द्वारा संभव होता है। वर्णिकाभंग में हस्तकौशल की थोड़ी भी विकृति चित्र के सौंदर्य और प्रभाव को नष्ट कर सकता है। इसलिए चित्रकला में वर्णिकाभंग की साधना अतिआवश्यक और कठिनतर मानी जाती है।

4 टिप्‍पणियां: